स्वामी रामदेव जी।

योगर्षि स्वामी रामदेव जी का जन्म हरियाणा में हुआ था। उनके माता-पिता श्रीमति गुलाब देवी एवं श्री रामनिवास जी है। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण विद्याल

Swami Ramdev

य में

प्राप्त की थी। 14 वर्ष की आयु में वे काल्वा (हरियाणा में जिंद के समीप) के गुरुकुल में प्रवेशित हुए थे। जहाँ वे आचार्य श्री बलदेव जी की संरक्षता (अध्यापन) के अर्न्तगत धन्य हुए। उन्होंने संस्कृत व योग में अपना अध्ययन किया एवं संस्कृत व्याकरण, योग, दर्शन, वेदों व उपनिषदों में विशेषज्ञता के साथ स्नाकोत्तर पदवी (उपाधि) अर्जित की। इसके पश्चात वे महर्षि दयानंद के जीवन व लेखनी से बहुत अधिक प्रेरित हुए एवं उन्होंने पूर्ण रुप से सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदी भाषाएं भूमिका इत्यादि का अध्ययन किया। योग, संस्कृत व्याकरण एवं आयुर्वेद के प्रतिपादक के रुप में महर्षि पतंजलि के चुबंकत्व के साथ-साथ इसके प्रभावों को उन पर डालने का प्रयास करना जारी रखा। अपने जीवन के थोड़े प्रारम्भिक समय में उन्होंने उसके लिए अपने लक्ष्यों को छोड़ दिया। इसलिए उन्होंने ब्रह्मचर्य व तप का मार्ग चुना। गुरुकुल से योग, पाणिनी के अष्ठाधायी एवं पतंजलि महाभाष्य में शिक्षण के कार्यकाल करने के पश्चात, वे सांसारिक गतिविधियों के विकर्षण से दूर व ऊँचे (उदात्त) हिमालय की गंगोत्री गुफाओं के लिए अपनी यात्रा पर निकल पड़े। गहरे ध्यान व तपस्वी अनुशासन एवं तपस्या के माध्यम से वे अपने द्वारा किये गये इन कार्य की स्पष्ट दृष्टि को विकसित करने में सक्षम हुएः-

  1. योग व आयुर्वेद का प्रचार व प्रसार।
  2. उन्होंने भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक प्रणाली में सुधार किया एवं सौभाग्य से वे एक सजाति आत्मा एवं सहपाठी आचार्य बालकृष्ण से मिले, जो एक समान खोज पर वहाँ बाSwami Ramdevहर निकले थे। वे आकस्मिक ही इस अद्भुत कार्य को आरम्भ करने के लिए एक साथ आये। स्वामी जी ने रहस्य रहित व पतंजलि के योग की लोकप्रियता की महती जिम्मेदारी स्वयं पर ली, जबकि आचार्य जी ने औषधि की आयुर्वेदिक प्रणाली की प्रभावकारिता में लोगों के विश्वास को पुनः स्थापित करने के कर्तव्य के लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित किया। स्वामी जी का मुख्य केन्द्र-बिन्दु भारत के साथ-साथ पूरे विश्व के लोगों को इनकी जीवन शैली के रुप में योग एवं आयुर्वेद को ग्रहण करके (अपनाकर) पूर्ण स्वस्थ बनाना है। व्यवहारिक गैर सिद्धान्तवादी व गैर साम्प्रदायिकता में व्याधियों व विकारों की चिकित्सा के लिए उन्होंने अपनी पहुँच बनार्इ। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख अथवा र्इसार्इ किसी भी धर्म के व्यक्तियों में एक ही शरीर रचना विज्ञान एवं शरीर विज्ञान है। इसलिए वे योग व आयुर्वेदिक चिकित्सा से सभी को लाभ पहुँचा सकते है। उन्होंने विस्तार से इस विषय पर दो प्रसिद्ध हिन्दी पुस्तकों में योग से होने वाले लाभों के बारे में बताया हैं।
  3. योग साधना एवं योग चिकित्सा रहस्य।
  4. प्राणायाम रहस्य

अपने योग शिविरों में, देश के सभी भागों से हजारों की संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया। उन्होंने आठ प्राणायाम (1भस्त्रिका 2.कपालभाति 3.बाह्य / अग्निसार 4.उज्जैयी 5.अनुलोम-विलोम 6.भ्रामरी 7.उद्गीठ 8.प्रणव),कुछ उक्समा (सरल) व्यायामों, एवं विभिन्न व्याधियों के लिए कुछ विशिष्ट आसनों पर जोर दिया है, जो कि कुछ सरल घरेलू उपचार व आयुर्वेदिक औषधि के रुप में भी कार्य करते है। समय के एक छोटे से काल (अवधि) में योग व आयुर्वेदिक चिकित्सा का परिणाम केवल उत्साहजनक ही नहीं बल्कि चकित कर देने वाला भी है। लोगों ने योग के लिए एक महत्वपूर्ण पथ को ग्रहण किया है। वे, स्वामी जी की पतंजलि योगपीठ द्वारा प्रशिक्षित व प्रमाणित योग शिक्षकों के मार्गदर्शन के तहत (अन्तर्गत)योग कर रहे है, एवं विभिन्न भारतीय टी0वी0 (दूरदर्शन)चैनलों, जैसे कि आस्था, जीटीवी, स्टार, सहारा इत्यादि चैनल, पर इसे देख रहे है एवं इसका अनुसरण कर रहे है। लोग पतंजलि योगपीठ द्वारा तैयार की गर्इ सीडी, डीवीडी, ऑडियो-विडियो से योग सीख रहे है। स्वामी जी ने अपनी पुस्तक योगदर्शन में सरल हिंदी में पतंजलि के योगसूत्रों को स्पष्ट करने की कोशिश की है। अपने सपने को मूर्त रुप देने के लिये एक दृष्टि के साथ, स्वामी जी ने सबसे पहले भारत के उत्तराखण्ड राज्य में स्थित हरिद्वार के कनखल में वर्ष 1995 में दिव्य योग मंदिर को स्थापित किया, जो हिमालय में गंगोत्री पर स्थित ध्यान केन्द्र, ब्रह्मकल्प चिकित्सालय, दिव्

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य फार्मेसी, दिव्य प्रकाशन, दिव्य योग साधना, वर्ष 2005 में दिल्ली में स्थापित पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ, महाशय हीरालाल अर्श गुरुकुल, किशनगढ़, घासेड़ा, महेन्द्रगढ़, हरियाणा, योगग्राम एवं हाल ही में दिल्ली में स्थापित भारत स्वाभिमान (ट्रस्ट) का अनुगमन करता है।

जबकि योग से देश की शारीरिक, मानसिक व अध्यात्मिक स्वास्थ्य, मंदी, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक प्रणाली का ख्याल रखने से देशभक्ति उत्साह, निर्भयता एवं मजबूत चरित्र को केवल माध्यम से उबारना होगा। जिसमें वह स्वयं को ही एक जीवंत उदाहरण के रुप में प्रस्तुत करते है। हाल ही में उन्होंने स्वाभिमान आंदोलन, जिसके अन्तर्गत भारतीय सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक परिदृश्य की सभी भूतल वास्तविकताएँ आती है, का शुभारम्भ किया। उन्होंने लोगों को आगे आने एवं देश व लोकतंत्र को बचाने के लिये आह्वान किया है। वे नशा-मुक्त, शाकाहारी, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत, अपने स्वदेशी उत्पादों पर गर्व यह सब देखना चाहते है। उनके मन में अध्यात्मवाद के आकाशीय क्षेत्रों (गोलों) को बढ़ाया जा सकता है। परन्तु उन्होंने अपने पैर पृथ्वी पर मजबूती से जमाये हुए हैं, जहाँ वह इस तरह की चिकित्सा, मिट्टी के संवर्धन, गाय प्रजनन, गाय संरक्षण, गंगा सफार्इ आदि के रुप में सांसारिक चिंताओं के लिए अत्याधिक क्रियाशील हुए है।

उन्हें विश्वविद्यालयों द्वारा अपने युगान्तकारी कार्य के लिए विभिन्न सम्मान/सम्मानार्थ डाक्टर की उपाधि से भारत व विदेश में सम्मानित किया गया है। यू.एन.ओ. के महासचिव के निमंत्रण पर, न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संगठन के मुख्यालय से पूरे विश्व से गरीबी उन्मूलन के विरुद्ध प्रस्ताव पारित करने के लिए इस कार्यक्रम में स्वामी जी ने आगे बढ़कर इसका नेतृत्व किया।