ज्ञान की बातें

जीवन, र्इश्वर का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। एक मानव (इंसान) के रुप में हमारा जन्म, र्इश्वर का सबसे बड़ा उपहार है। तुच्छ लक्ष्यों (गतिविधियों) के लिये जीवन जीना जीवन के लिए अपमान स्वरुप है। यदि हम अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग करते है तो हम महान व्यक्ति, देवदूत व उत्कृष्ट व्यक्ति बन सकते है। प्रत्येक मनुष्य में अच्छे व बुरे गुण होते है। योग से जुड़े हुए होने के द्वारा बुरे गुण दूर हो जाते है एवं अच्छे गुण वर्धित हो जाते हैं।

मैं र्इश्वर का प्रतिनिधि हूँ।

मेरा मस्तिष्क तेज, बुद्धि, अंतदृर्ष्टि एवं एक ब्राह्मण की विवेकी शक्ति के साथ सम्पन्न है।

Swami Ramdev

Swami Ramdev

मैं, माता भारती, माता भूमि पुत्रोहा, पृथ्वीया का अनश्वर पुत्र हूँ।

मनुष्य को घृणा, निन्दा, विद्वेष व र्र्इष्या देना सदैव डर का सबब बन रही है कि कोर्इ मनुष्य जो इनकी घृणा के विषय (वस्तु) हो वह उनमें घृणा एवं निन्दा प्रारम्भ नहीं होने दे सकता है।

मेरे र्इश्वर प्रत्येक प्राणी की आत्मा के अन्दर मौजूद है। मैं माता भारती का सबसे पहला पुत्र हूँ एवं उसके बाद एक परित्यागकर्ता (सन्यासी), गृह स्वामी (कुलपति), अभिनेता, कर्मचारी, अधिकारी अथवा व्यवसायी हूँ।

इदम् राष्ट्राय इदम् नमम्……..मेरा यह जीवन, मेरे राष्ट्र के हित के लिए है। यह निन्गक दूसरों के जीवन के अंदर एवं बाहर देखना पसन्द करता है, परन्तु वह स्वयं के अंदर व बाहर देखना नहीं चाहता है।

मैं सदैव प्रभु में हूँ एवं प्रभु सदैव मुझमें हैं। इस पवित्र भूमि देश में मेरा जन्म होने के लिए मैं भाग्यशाली हूँ। मैं पुष्पों से माता भारती की पूजा करुंगा, जिससे मैं नेक कार्यो में डूबा रहूँ। ज्ञान केवल जानने के लिए ही नही होता, बल्कि इसके बजाय यह कुछ के साथ स्वयं की पहचान है।

वहाँ दृढ़ता, न जिद, बहादुरी, न आतुरता, करुणा, न कमजोरी होनी चाहिए।

  1. दृढ़ संकल्प की आग मेरे अंदर निरन्तर जलती है।
  2. मेरे जीवन का मार्ग हमेशा प्रकाशित होता है।
  3. सदैव अपने मुख (चेहरे)पर खुशी व मुस्कान रखो।
  4. दूसरों को खुशी देने से आपको भी खुशी प्राप्त होगी।

माता-पिता के चरणों में लेटने से ही सभी चार पवित्र तीर्थस्थन है। माता-पिता ही इस पृथ्वी पर र्इश्वर है। अपनी माता, अपने पिता, अपने शिक्षक एवं अपने अतिथि की पूजा की संस्कृति को अपनाओ-”मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः, आचार्य देवो भवः, अतिथि देवो भवः”।

कभी भी अपने भूतकाल को मत भूलो, अपने अतीत को याद करने से वह हमें गलत होने से (जाने से) बचाता हैं। यदि हम अपने बचपन एवं माँ की कोख का स्मरण रखते हैं, तब भी हम अपने माता-पिता के लिए कभी भी कृतघ्न नहीं हो सकते है।

यदि एक के बाद एक अतीत को याद करते है, तो वह एक अतीत गगनचुम्बी उपलब्धियों को बनाने के बाद भी पृथ्वी पर अपने पाँव दृढ़ता से जमाये हुए है। एक व्यक्ति निंदा व किसी की सराहना में अपना समय बर्बाद करता है, जो कि केवल मूखर्तापूर्ण किया गया अफसोस का विषय है।

खुशी बाहर से नहीं अपितु अंदर से आती है। प्रभु हमें सदैव हमारी क्षमता, अच्छे या बुरे गुणों एवं परिश्रम से अधिक देता है। आयुर्वेद हमारी भूमि, हमारी संस्कृति एवं हमारी प्रकृति से जुड़ी हुर्इ सुरक्षित चिकित्सा प्रणाली है। हमें अपने आचरण द्वारा, ना कि अधिक उपदेश द्वारा संस्कृति में परिवर्तन लाने में विश्वास हैं। मधुर एवं प्रभावी वाणी की उत्पत्ति सोच की पवित्रता से हो, विचारों के सहारे मैं हर पराजय को विजय में बदल सकता हूँ।

यदि एक व्यक्ति अशुद्ध विचारों से चरित्रहीन बन सकता है, तो उसे शुद्ध (स्पष्ट)व महान विचार (सोच)के द्वारा सांस्कृतिक रुप से परिष्कृत कर सकते है। अपयश होने पर द्वेषपूर्ण आक्रोश की आग में नहीं जलो, एवं सदैव एक आत्म स्थिर व समबुद्धि (स्थिर चित्तवृत्ति वाला) रखो। यह वास्तव में प्रगति का आधार है।

हमारे सुख-दुःख का कारण अन्य व्यक्ति अथवा परिस्थितियाँ नहीं है, बल्कि हमारे अपने अच्छे एवं बुरे विचार हैं। वैचारिक दरिद्रता, दुःख, अभाव पीड़ा व देश की गिरावट का कारण है। वैचारिक दृढ़ता, सुख, समृद्धि व देश के विकास के लिए आलोचनात्मक महत्व है।

हमारा इस दुनिया में आना एवं इस दुनिया से जाना दोनों गौरवशाली होने चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य हमारा जन्म-अधिकार है। एक व्यक्ति को अपनी अन्तिम सांस तक भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। हमारा मन सेवा कार्य करने के बिना विशुद्ध नहीं है, एवं महान आत्मा का सार, मन की शुद्धि (पवित्रता) के बिना ही साधित होता है।

चरित्र की पूजा करो, ना कि एक व्यक्ति की तस्वीर की। भोजन, व्यक्ति की प्रकृति एवं स्वभाव को निर्धारित करता हैं। शाकाहारी भोजन आपको शान्त स्वभाव देता है। मांसाहारी भोजन आपकों उग्र स्वभाव का बनाता है। हमारी अंतरात्मा, दागी व प्रदूषित विचारों के साथ पीडि़त (दूषित) है। इसे मात्र अभ्यास के द्वारा परिष्कृत किया जा सकता है।

यह शरीर एक मंदिर, एक शिवालय है। यह शरीर भगवान का मंदिर हैं। मौसमी (सामयिक), सीमित एवं अनुकूल (गुणकारी) भोजन खाओं,ऋतभूख, मितभूख, हितभूख। अपने शरीर को शुद्ध व साधारण, संतुलित एवं पौष्टिक भोजन को उपयोग में लाने से स्वस्थ बनायें। मनुष्य स्वभाव से शाकाहारी होता है। उसकी शरीर की रचना एक शाकाहारी प्राणी की है; यह एक वैज्ञानिक सत्य है।

असंभव को संभव बनाने के लिए आप में अपार क्षमता, शक्ति एवं ऊर्जा हैं। अपने कौशल, वीरता व साहस के साथ तुम समय की रेत पर एक नया इतिहास लिख सकते हो। समय ही संपत्ति है। समय एक व्यक्ति, जो समय का सम्मान नहीं करता है व समय के साथ तालमेल नहीं रखता है, को कभी भी क्षमा नहीं करता हैं।

हर जगह (सर्वत्र) गैर-भेदभाव हो रहा है। सभी के साथ समान रुप से व्यवहार करो, परन्तु यह सदैव संभव नहीं है। वहां धर्म, राष्ट्रीय प्रकृति (लोकाचार) से बड़ा नहीं हैं एवं वहाँ भगवान, राष्ट्र-देवता की तुलना में बड़ा नहीं है। राष्ट्रीय हित सर्वोच्च राजा। आयुर्वेद, प्राकृत चिकित्सा एवं योग जिसका कोर्इ हानिकारक दुष्प्रभाव नहीं हैं, को ऋषियों (साधु व संत)भूमि में पुनःस्थापित किया जायेगा।

यह राष्ट्र सुसंरक्षित नहीं हो सकता हैं, जहाँ नेतृत्व में उद्यम, विनम्रता, पारदर्शिता एवं दूरदर्शिता की कमी है। स्त्री का अपमान माँ का अपमान है। स्त्री की वास्तविकता सुंदरता उसके शरीर में नहीं बल्कि उसकी विनयशीलता से है। अपनी राष्ट्रीय भाषा के रुप में एक विदेशी भाषा का प्रयोग करना, शर्म व अवमान (मानभंग) की बात बोलना है।

इस समाज व राष्ट्र का विनाश अपरिहार्य हैं, जहाँ महान पुरुष श्रद्धेय व श्रद्धास्पद (आदरणीय) नहीं हैं; एवं शिक्षा का एक राष्ट्रवादी होना है। एक जो स्वदेशी चिकित्सा प्रणाली जैसे योग, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध इत्यादि के पूर्णविकास एवं अनुसंधान (शोध) के लिए कृत संकल्प हैं, एक राष्ट्रवादी है।

एक जो भारतीय भाषाओं एवं राष्ट्रीय भाषा से प्रेम करता है एवं राष्ट्रीय भाषा के लिए सर्वोच्च स्थान के सामंजस्य पर एक होने से वह राष्ट्रवादी है। एक जो अपने दैनिक जीवन में शून्य प्रौद्योगिक के साथ विनिर्मित विदेशी वस्तुओं का प्रयोग नहीं करता है, एक राष्ट्रवादी है।

प्रेम कार्य (कार्यकलाप) का एक सौ वर्ष लम्बा जीवन है; यह जीवन का एकमात्र उत्कृष्ट मार्ग है। कार्य (कर्म) ही धर्म है। अपने कार्यकलाप (कर्म)के साथ र्इश्वर की पूजा करो। कार्य (कर्म) ही पूजा है।

परमानंद, अविरल (सतत) आत्मनिरीक्षण एवं परम ज्ञान के प्रबोधन के माध्यम से प्राप्त होता है।

”वसुधैव कुटुम्बकम”-यह पूरा विश्व, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसार्इ, इत्यादि बनने से पहले मेरा परिवार है। हम सभी मनुष्य हैं एवं र्इश्वर एक परम र्इश्वर है, जो कि हम सबके पिता है।

हम गर्व के साथ कहते है कि हम एक हैं।

हम साम्प्रदायिकता एवं प्र्रान्तीयता के समर्थक नहीं है; हम राष्ट्रवाद, मानवतावाद एवं अध्यात्मवाद के समर्थक हैं। मेरी धड़कन, स्पदंन व साँसे, मातृभूमि के लिए है। एक महान व्यक्ति इस आदर्श-स्वरुप रहता है कि वह लापरवाह हो, व्यस्त हो, संतुष्ट किया गया हो। यदि इस विश्व में खून खराबा को किसी उपाय से रोका जा सकता है तो यह अष्टांग (आठ-अंगवाला) योग है।

एक जो भूमि, संस्कृति, सभ्यता व इस प्रदेश के लोगों से प्रेम नहीं करता एवं गर्वित महसूस नहीं करता, उसे राष्ट्रीय हित के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का सामंजस्य करना चाहिए। पूरे विश्व का इतिहास इस तथ्य का गवाह है कि जब देश के करोड़ों लोग एक आंदोलन का प्रारम्भ करते है तो प्रणाली (तन्त्र), सत्तारुढ़ी शक्तियाँ एवं इतिहास एक परिवर्तन से गुजरता है, एवं असम्भव सम्भव में बदल जाता है। लाखों की मृत्यु के लिए शराब (नशा) ही जिम्मेदार हैं, इसके लिए प्रोत्साहित करना मानवाधिकारों व स्वतन्त्रता का मतलब नहीं हैं। यदि हम संवेदनशील होते है, तो हम दर्द व पीड़ा से ग्रस्त (बीमार) लाखों लोगों को स्वतन्त्र करा सकते है।

ये शराब के व्यापारी एवं माफिया हमारे देश के लोगों की मृत्यु के दोषी हैं, एवं करोड़ों लोगों के बच्चों की हत्या की कोशिश की है एवं इन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया जायें अथवा मौत की सजा सुनार्इ जायें। यह नशे की अवस्था में मत देने के लिए एक अपराध है हम पर शासन नहीं होगा, परन्तु शासन के नाम पर शोषण बर्दाशत नहीं करेंगे। मेरी राजनीतिक विचारधारा सर्वदलीय एवं अदलीय (स्वतंत्र) है।

सभी दलों में वे जो नेक व बेदाग चरित्र के पुरुष, मेरे अपने हैः-यही वजह है कि मैं सर्वदलीय हूँ एवं सभी दलों में वहां उन व्यक्ति जिनसे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ हैं, के साथ काफी भ्रष्ट, बेर्इमान व चरित्रहीन व्यक्ति हैः- यही वजह है कि मैं किसी दल (स्वतन्त्र) में नहीं हूँ। एकता में शक्ति है। जब पत्थरों (शिलाओं) को एक साथ रखा जाता है, तो एक इमारत खड़ी होती है। जब धागों को एक साथ बुना जाता है, तो कपड़ा बनता है, एवं जब अवयव व अंगों को मिलाते है तो शरीर बनता है। तो जब भ्रष्ट लोग एकता बना सकते है, तो अच्छे व नेक व्यक्ति एकजुट क्यों नहीं हो सकते? इसका अंत कर दे।

रोगी का हित ही सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस सिद्धान्त का दिवस औषधि की प्रणालियों के बीच सभी संघर्ष व टकरावों के स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में लाभ स्वीकृति एक अंत के लिए लायी जायेगी एवं विनाशकारी वाद-विवाद को रचनात्मक संवाद द्वारा प्रतिस्थापित किया जायेगा।

विमुक्ति व स्वर्ग के बाद उत्कंठ के बजाय कुछ कर्म करो। या तो एक रोगी व्यक्ति हो या फिर खुशी निश्चित  ना हो, तो एक योगी हो। ब्रह्मचर्य (ब्रह्मत्व), प्रामा (प्राण-श्वास) के विनाश के विरुद्ध आत्मरक्षा का एकमात्र साधन हैं एवं इस विश्व में मन कामुक लोभों से भरा है। सक्रिय ध्यान का अर्थ- सदैव जागो, सदैव सतर्क, सदैव प्राकृतिक व सहज, सदैव समझदार हो। अहंकार से दूर, ओसारा ही समर्पण है। हमारे पास 1,96,08,53,109 वर्ष पूर्व एक शानदार पुरातन भूतकाल है। वैराग्य (गैर-आसक्ति) पलायनवाद नहीं है; परन्तु प्रभेद (विवेका) का चरमोत्कर्ष है।- न तो जीवन से बचों, और न ही मृत्यु का डर हो; हमें धैर्य को बनाये रखना है;-यह योग है।

अपने कर्म के फल के लिए किसी भी इच्छा के बिना वैराग्य के साथ जीवन जीना ही सन्यास (संस्कार-रुप) है। जो आपको सत्य का एहसास कराता है एवं मिथ्या से आपको स्वतन्त्र करें, वह (महान साहचर्य / सभा) है। विश्वास माँ है, विश्वास पिता है, विश्वास (श्रृद्धा) दिव्य ज्ञान की भावना है। विश्वास सच्चा ज्ञान एवं परम शांति के लिए एक उन्नति का मार्ग है।

एक के बाद एक शक्ति, ज्ञान, अपमान व संदेहात्मक विश्वास का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जीवन में संदेह कम्प्यूटर में वायरस की तरह है। यह प्रारम्भिक प्रभावों (सासकरस) की नींव पर है जिससे जीवन के भवन व विश्व का साम्राज्य बनाया गया है।

वर्तमान में जीना ही योग है।

संतुलन/ साम्यवस्था, विश्व व जीवन के शाश्वत सिद्धान्त है। स्वयं में संतुलन ही स्वास्थ्य है। सभी विकार, शारीरिक व भावनात्मक असंतुलन, अनर्गलता, अनियमितता व चरम सीमाओं से उत्पन्न होते है। पूर्ण स्वास्थ्य की अवधारणा को केवल योग व आयुर्वेद के माध्यम से साधित किया जा सकता है। एक योगी, बेसहारा, दुःखी, असहाय व लाचार होने के रुप में स्वयं के बारे में कभी नहीं सोचेगा। मेरा कर्म मेरा धर्म है। मैं एक वैयक्तिक नहीं हूँ; मैं पूरे राष्ट्र का साकार रुप हूँ।

मेरे प्रभु ने मुझे पृथ्वी की तरह धैर्य की विरासत, आग की तरह चमक, पवन की तरह गति, जल की तरह शीतलता एवं आकाश की तरह विशालता से सम्पन्न किया है। राष्ट्रीय लोकाचार सबसे बड़ा धर्म है। राष्ट्र-देव, सबसे बड़े देवता है, एवं देश को प्रेम करना, सर्वोच्च क्रम का प्रेम हैं। राष्ट्रीय हित सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। राष्ट्र मेरे लिए सब कुछ हैं।

गलतियों को दोबारा दोहराना नहीं चाहिए; उनकी पुनरावृत्ति प्रगति को रोकती है एवं आध्यात्मिक शक्ति दुर्बल होती है। हमे धर्म को एक रुप देना चाहिए जो कि इस पृथ्वी पर योग आन्दोलन के माध्यम से प्राचीन साधु व संतों (ऋषियों) की संस्कृति से पुनः स्थापन द्वारा स्वीकार्य एवं अविरोध है।

यह भारत की भूमि पर स्वर्ग हैं। इसका जल अमृत है। प्रत्येक बच्चा बहादुर (वीर) भगत सिंह एवं प्रत्येक बहन झांसी की रानी हैं। केवल वे व्यक्ति ही सच्चे पांडत्यदंभी, शासक एवं नेता हो सकते है, जिसमें उसके स्वभाव में एक पुष्प की कोमलता एवं वज्र की दृढ़ता एवं कठोरता हो।