वर्तमान की आवश्यकता ‘यज्ञ’
भारतीय संस्कृति में ‘यज्ञ, योग एवं आयुर्वेद’ जैसी अमूल्य विद्याएं एवं विधाएं हैं, जो इस संस्कृति की ‘मुकुटमणि’ है। इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो ‘भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण’ से लेकर राजा- महाराजाओं, ग्रामवासियों व अरण्यवासि-ऋषियों की कुटियों तक नित्य व नैमित्तिक यज्ञ का प्रचलन देखने को मिलता है, जो सार्वभौमिक, वैज्ञानिक एवं पंथनिरपेक्ष पावनी परंपरा है।
‘पंच-महाभूतों’ से निर्मित इस जगत् का जीव मात्र प्रयोग ले रहा है। सभी लोग एक ही वायु में श्वास लेते, एक ही सूर्य से ऊर्जा लेते, एक ही जल का पान करते, एक ही भूमि पर विचरण करते हैं तथा एक ही आकाश-मंडल के नीचे बसते हैं। हम सब समान हैं एक हैं, चाहे ‘हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि जो भी है सब मनुष्य ही है’। मनुष्य जो सोच-विचार पूर्वक कार्य करतें है या कर सकते हैं। हम सब एक ‘दिव्य-शक्ति (ईश्वर) की संतान है’, जिसने हमें पंचभूतों से निर्मित जगत् प्रदान किया है। इन्हीं पंचभूतों के बीच हमारा पूरा जीवन चलता है व समाप्त हो जाता है। मनुष्य का जीवन इस पंच-भूतात्मक प्रकृति के संतुलन में है। आज निरंकुश भोगवाद के कारण प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण प्रदूषित हो चुका है। प्रदूषण एक ऐसा जहर है, जो कालांतर में अपने ही जनक को भस्मासुर की तरह भस्म कर देता है। आज हमने वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण से लेकर आण्विक-प्रदूषणों को जन्म दिया है। 130 देशों के 2500 साइंटिस्टों की टीम ने अपनी रिपोर्ट ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल आॅन क्लाइमेट चेंजिंग’ में जो बातें कही है वह किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रखती। धरती का तापमान इस सदी में 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा, जिससे मौसम में आमूलचूल परिवर्तन होंगे। ‘ग्लेशियर तेजी से पिघल जायेगें, समुद्रतटीय शहर संकट से घिरे होंगे, बीमारियों का खौफनाक हमला होगा, जीवनदायिनी मां गंगा सूख जाएगी, कई पेड़-पौधें व पशु-पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो जायेंगी, फसलों की पैदावार घटेगी, बूंद-बूंद को मोहताज होगी धरती व कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा,तो कहीं तूफान व अतिधूप पड़ेगी, फसलों की पैदावार घटेगी, जिससे बहुत बड़ी जान-माल की हानि होगी। शताब्दी के अंत तक पूरी दुनिया में एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों के सामने पीने के लिए पानी नहीं होगा। इस रिपोर्ट में कहे अनुसार आज होने भी लग चुका है। आज भारत जैसे देश की 40ः नदियाँ सूख चुकी है, 55ः कुएं सूख चुके हैं, 45ः भूगर्भ जलस्तर नीचे जा चुके हैं। पूरी दुनिया के 10 बड़े ऐसे शहर है, जहां पर पानी की आपूर्ति कुछ ही दिनों के बाद समाप्त हो जायेगा, मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक जल का भय जहां एक ओर है, तो वहीं दूसरी ओर वायु का। मनुष्य अन्न के बिना 3 महीने, जल के बिना 3 सप्ताह जीवित रह सकता है, परंतु वायु के बिना 3 मिनट भी नहीं। वही वायु जो जीवन देती हैं, आज जानलेवा हो चुकी है।
पूरी दुनिया में वायु-प्रदूषण का तांडव हो रहा है, ‘हर 8 में से एक व्यक्ति वायु-प्रदूषण से मृत्यु को गले लगा रहा है, जिसमें 36ः लोग फेफड़ों के कैंसर से मर जाते हैं’। भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इसके खौप का डंका बज चुका है तथा वायु-प्रदूषणरूपी भस्मासुर पूरी मानव सभ्यता के साथ-साथ अन्य जो पशु-पक्षी, कीट-पतंगें, वनस्पति-औषधियों से लेकर संपूर्ण अस्तित्व को निगलने को तैयार है। ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन ;ॅभ्व्द्ध के आंकड़ों के अनुसार 70 लाख से अधिक लोग केवल वायु-प्रदूषण के कारण मौत के मुह में समा जाते हैं’। पूरी दुनिया में प्रकृति के साथ अब मनुष्य के ऊपर भी खतरे की घंटी बज चुकी है। यह ग्लोबल वार्मिंग अब ‘ग्लोबल वार्निंग’ हो चुकी है, जिसका समाधान है- ‘यज्ञ, वृक्षारोपण एवं वैदिक जीवन-शैली’।
वेद का उद्घोष है-
‘अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः’ अर्थात् यज्ञ पंचभूतात्मक देह से लेकर ब्रह्मांड तक में स्वास्थ्य एवं संतुलन कायम करता है। वैज्ञानिक शोध दर्शाते हैं, कि यज्ञाग्नि में उत्तम गुणवत्तायुक्त घृत-जड़ी-बूटियां एवं समिधा आदि की मंत्रोच्चारण पूर्वक आहुति देने पर वह द्रव्य अत्यंत सूक्ष्म व आरोग्यवर्धक होकर हमें स्वास्थ्य एवं दीर्घायु प्रदान करता है। यज्ञ अस्थमा, कैंसर से लेकर कोरोना जैसी जानलेवा रोगों से बचाने के साथ ही तनाव, अनिद्रा, अवसाद आदि मानसिक रोगों को दूर कर शांति व सौमनस्य प्रदान करता है। ‘यज्ञ से विषैली गैसों में भारी मात्रा में कमी आती है व जानलेवा बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि नष्ट होते हैं एवं रेडिएशन को भी कम करता है’। यज्ञ भूमि की उर्वरा शक्ति एवं फलों के एक्टिव कंपाउंड को बढ़ाता है तथा रोगों की रोकथाम भी करता है। ‘यज्ञकृषि से उत्पन्न अन्न-फल आदि पोषक तत्वों से युक्त एवं स्वादिष्ट होते हैं’। यज्ञ उत्तम वर्षा तथा जलाशयों का शोधन करने वाला होता है। ‘यज्ञ जड़ एवं चेतन दोनों में सात्विकता का संचार करता है’। यज्ञ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों प्रकार का लाभ प्रदान करता है। यज्ञ भौतिक जीवन में धन-धान्य आदि ऐश्वर्य एवं आध्यात्मिक जीवन में मानवीय चेतना का उत्कर्ष करके अतिमानस चेतना की ओर अग्रसर करता है। ‘यज्ञ से अभ्युदय एवं निश्श्रेयस दोनों की सिद्धि होती है’।
‘संसार का प्रत्येक मनुष्य धर्म के नाम पर जो भी क्रिया कलाप करता है उसका भी प्रयोजन यही है’। ‘अतः यज्ञ ही परम धर्म है व यज्ञ को जीवन में धारण करना अर्थात् यज्ञ करना तथा यज्ञीय जीवन जीना यही सच्ची धार्मिकता है’। ऐसे धर्म की रक्षा करना ही हमारे जीवन व जगत् की रक्षा करना है तथा धर्म की रक्षा न करना ही जीवन व जगत् को नष्ट करना है। ‘धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः’।तो आइए हम संकल्प लें संसार के श्रेष्ठतम कर्म यज्ञ को अपनाएं, पिंड और ब्रह्मांड में संतुलन कायम करने वाले ‘यज्ञ को जीवन का अभिन्न अंग बनाएं एवं प्रकृति मां के प्रति अपने ऋणों को अदा करें’।
‘विश्व स्वास्थ्य का एक नारा, यज्ञ से होगा जग उजियारा’

अग्निहोत्र महिमा
एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन्।
तन्नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः।। -मु.उ. 1,2,5
सात लपटों वाली अग्नि की शिखाओं में जो यजमान, ठीक समय पर आहुतियां देता हुआ कर्म को पूरा करता है उसको ये आहुतियां, सूर्य किरणों में पहुंच कर संचित कर्मरूप होकर वहां पहुंचा देती है जहां जगत् के आधार परमात्मा को साक्षात् जाना जाता है।
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत।। -छा.उ. 5,24,5
इस लोक में जैसे भूखे बच्चे, माता से सुखादि की याचना करते हैं। ऐसे ही सारे प्राणी, अग्निहोत्र ;यज्ञद्ध की उपासना करते हैं।
यज्ञों में अग्निहोत्र महत्वपूर्ण माना गया है, इसलिए उसका विशद वर्णन मिलता है:-
अग्नये चेव सायं, प्रजापतये चेत्यब्रवीत्। सूर्याय च प्रातः प्रजापतये चेति।।
अग्निहोत्र में सायंकाल अग्नये एवं प्रजापतये तथा प्रातः काल सूर्याय और प्रजापतये बोलते हुए आहुति दी जाती है।
अग्निहोत्रे स्वाहाकारः – अग्निहोत्र में स्वाहा बोलना चाहिये।
एतद्वै जरामर्य सत्रं यदग्निहोत्रम्।
जरया ह वा मुच्यते मृत्युना वा।।
यह अग्निहोत्र जरामर्य सत्र है क्योंकि यह अत्यधिक अशक्तता अथवा मृत्यु के बाद ही छोड़ा जा सकता है।
अग्निहोत्रेऽश्वमेधस्याप्तिः – अग्निहोत्र करने पर अश्वमेध का फल मिलता है।
मुखं वा एतद्यज्ञानां यदग्निहोत्रम्। – यह अग्निहोत्र यज्ञों का मुख है।
सर्वस्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते स य एवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति।
जो मनुष्य अग्निहोत्र करता है वह सब पापों (दोषों या प्रदूषणों) से छूट जाता है।

चार गुणयुक्त हविद्र्रव्य
स्वामी दयानन्द जी ने यजुर्वेद भाष्य तथा स्वरचित अन्य ग्रन्थों में यज्ञसामग्री के चार गुणों का उल्लेख किया है-
अग्निहोत्रमारभ्याश्वमेधपर्यन्तेषु यज्ञेषु सुगन्धिमिष्टपुष्टरोगनाशकगुणैर्युक्तस्य सम्यक् संस्कारेण शोधितस्य द्रव्यस्य वायुवृष्टिजलशु(िकरणार्थमग्नौ होमो क्रियते, स तद्वारा सर्वजगत् सुखकार्येव भवति।
अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त जो कर्मकाण्ड है, उसमें चार प्रकार के गुणयुक्त द्रव्यों का होम करना होता है, वे हैं-
सुगन्धित- कस्तूरी, केसर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री आदि। (नागरमोथा, बालछड़, खस, लौंग, तुमुल, तेजपात, तालीसपत्र, गुगल, सुगन्धबाला, सुगन्धकोकिला, कुलंजन, मुलेठी, हाउबेर आदि भी सुगंधित द्रव्य हैं)।
मिष्टगुणयुक्त- शक्कर, शहर, छुहारा, किशमिश, मुनक्का आदि एवं मोहनभोग, मीठाभात, लड्डू, आदि।
पुष्टिकारक- घृत, दूध, फल, कन्द, अन्न, बादाम, काजू, पिश्ता आदि।
रोगनाशक- सोमलता (गिलोयद्), ब्राह्मी, चिरायता, हरड़, कपूरकचरी, शतावर, अडूसा, इंद्रायण की जड़, देवदारू, पुनर्नवा, क्षीरकाकोली, शालपर्णी, मकोय, आंवला, खूबकला, गोखरू, रास्ना, गुलाबफूल, जीवन्ती, पाण्डरी, वायविडंग आदि।
इन चारों का परस्पर शोधन, संस्कार और यथायोग्य मिलाकर अग्नि में युक्तिपूर्वक जो होम किया जाता है, वह वायु एवं वृष्टिजल की शु(ि करने वाला होता है। इससे सब जगत् को सुख होता है।

यज्ञ की परिभाषा-पर्यायवाची-प्रकार
येन सदनुष्ठानेन सम्पूर्णविश्वं कल्याणं भवेदाध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकतापत्रायोन्मूलनं
सुकरं स्यात् तत् यज्ञपदाभिधेयम्।
जिस सदनुष्ठान से सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो, तथा आध्यात्मिक-आधिदैविक-आधिभौतिक तीनों तापों का उन्मूलन, सरल हो जाये, उसे यज्ञ कहते हैं।
येन सदनुष्ठानेन स्वर्गादिप्राप्तिः सुलभा स्यात् तत् यज्ञपदाभिधेयम्।
जिस श्रेष्ठ अनुष्ठान से सुखविशिष्ठ की प्राप्ति सहज हो जाये, वह यज्ञ है।
इज्यन्ते (पूज्यन्ते) देवा अनेनेति यज्ञः।
जिससे देवगण पूजे जाते हैं, वह यज्ञ है।
इज्यन्ते सम्पूजिताः तृप्तिमासाद्यन्ते देवा अत्रेति यज्ञः।
जिस कार्य में देवगण पूजित होकर तृप्त हों, उसे यज्ञ कहते हैं।
येन सदनुष्ठानेन इन्द्रप्रभृतयो देवाः सुप्रसन्नाः सुवृष्टिं कुर्युस्तत् यज्ञपदाभिधेयम्।
जिस उत्तम अनुष्ठान से सूर्यादि देवगण अनुकूल वृष्टि करें, उसे यज्ञ कहते हैं।
वेदमन्त्रैर्देवतामुद्दिश्य द्रव्यस्य दानं यागः।
वेदमंत्रों के द्वारा देवताओं को लक्ष्य कर द्रव्य का दान यज्ञ है।
वैदिक कोश निघण्टु में यज्ञ के 15 पर्यायों का उल्लेख है- यज्ञः, वेनः, अध्वरः, मेधः, विदथः, नार्यः, सवनम्, होत्रा, इष्टिः, देवताता, मखः, विष्णुः, इन्दुः, प्रजापतिः, धर्म इति पंचदश यज्ञनामानि।
सात पाकयज्ञ- औपसन, वैश्वदेव, पार्वण, अष्टका, मासिक श्राद्ध, श्रवणा और शूलगव।
सात हविर्यज्ञ- अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रयण, चातुर्मास्य, निरुढ़पशुबंध, सौत्रामणी और पितृयज्ञ ।
सात सोमयज्ञ- अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्यमि।
नैत्यिक यज्ञ- जिनको प्रतिदिन आवश्यक रूप से करना अनिवार्य है। यथा- महर्षि मनु प्रोक्त ‘पंचमहायज्ञ’।
नैमित्तिक यज्ञ- जो किसी निमित्त से किये जायें, वे नैमित्तिक यज्ञ कहे जाते हैं। यथा- षोडश संस्कार, प्राकृतिक संयोग वा उत्पात के कारण किये जाने वाले यज्ञ। (प्रदूषण निवारक यज्ञों को नैमित्तिक कह सकते हैं)।
काम्य यज्ञ- जो किसी कामना विशेष से किये जायें। यथा- वर्षेष्टि, पुत्रेष्टि एवं चिकित्सा विशेष में जो यज्ञ किये जाते है।
सात्विक यज्ञ- अफलाकाड्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्विकः।। – गीता17.11
जो शास्त्रविधि से नियत किया हुआ तथा यज्ञ करना ही कत्र्तव्य है इस प्रकार मन को समाधान करके, फल को न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्विक है।
राजसिक यज्ञ- अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।। – गीता17.12
जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिये अथवा फल को भी उद्देश्य रखकर किया जाता है, उसे राजसिक यज्ञ कहते हैं।
तामसिक यज्ञ- विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।। – गीता17.11
शास्त्रविधि से हीन, अन्नादान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा के, बिना श्रद्धा के किये जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते है।

घृत

घृताहवन दीदिवः प्रतिष्म रिषतो दह। अग्ने त्वं रक्षस्विनः।।
घी से प्रदीप्त यज्ञाग्नि, हमारे प्रतिकूल शत्रुओं और दोषों को सर्वथा भस्म करने में समर्थ है।
जिघम्र्यग्निं हविषा घृतेन प्रतिक्षियन्तं भुवनानि विश्वा।।
सम्पूर्ण लोकों का आधार, प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान अग्नि को मैं होम के योग्य घी से प्रदीप्त करता हूँ।
यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभितत्पवन्ते।
घी की धारा से सम्पन्न होने वाला यज्ञ, पवित्रता देता है तथा औषधियों में रस का संचार करता है।
घृतमग्नेर्वध्य्रश्वस्य वर्धनं घृतमन्नं घृतम्वस्य मेदनम्।
घृतेनाहुत उर्विया वि पप्रथे सूर्य इव रोचते सर्पिरासुतिः।।
तेजयुक्त अग्नि का बढ़ाने वाला घृृत है। घृत उसका अन्न है, घृत ही उसका पोषक है, घृत से हुत अग्नि अधिक विस्तार को प्राप्त होता है। घी की आहुति दी जाने से यह अग्नि सूर्य के समान दीप्त होती है।
घृतेन द्यावापृथिवी पूर्येथाम्।
यज्ञ के माध्यम से घी को द्यौ तथा पृथिवीलोक में भरें।
घृतस्यास्मिन् यज्ञे धारयामा नमोभिः। घृतस्य धारा अभिचाकशीमि।।
इस यज्ञ में अन्न आदि पदार्थों के साथ घी की धारा बहायें।
अस्मभ्यं वृष्टिमा पव।।
यज्ञों में वायु आदि देवों का उत्तम आहार-घृत की धारा बहाये जिससे वे हमें सुवृष्टिप्रदान करें।
आज्येन वै वज्रेन देवा वृत्रमघ्नन्।।
देवगण घी रूप वज्र से शत्रुरूप प्रदूषण का विनाश करते हैं।
आज्यं वै यज्ञः- घी ही यज्ञ है।
यदसर्पत्तत्सर्पिः अभवत्।।
जो सर्प की तरह गतिशील है वह घृत सर्पि है अथवा जिस तरह सर्प हवा का जहर पीकर वायु को विषमुक्त करता है, वैसे ही सर्पि भी यज्ञ के द्वारा पर्यावरण को प्रदूषणमुक्त करने में समर्थ है।

गुग्गुल धूप की महिला

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते। यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते।। -अथर्व.१९.३८.१
जिस व्यक्ति को गुग्गुल औषध की सुगन्ध प्राप्त होती है, उसे न टी.बी. ;ट्यूबरकुलोसिसद्ध आदि रोग बाधित करता है, न ही शाप, मानस रोग आदि ।
घृतगुग्गुलुहोमे च सर्वोत्पातादिमर्द्दनम्। -अग्नि पुराण
घी और गुग्गुल के हवन से सभी प्रकार के उत्पातों का निवारण होता है।
औषधीय गुण- त्रिदोषशामक, पुष्टिकारक, बलकारक, हृद्य, कण्ठकारक आदि।
रासायनिक संघटन- वाष्पशील तैल, कौमीफोरिक अम्ल, गुग्गुलस्टेराल, क्वर्सेटिन, प्लेनोलिक, ओलीक, स्टीयरिक,पॉमिटिक, सिटोस्टेरॉल, कैपेस्टेरॉल एवं फिनोलिक रेजिन होता है। वाष्पशील तेल में क्युमिनिक एल्डीहाईड, युजिनॉल, मेटाक्रिसोल, पाइनीन, लिमोनीन, डाईपेन्टीन तथा सेसक्यूटर्पीन होता है।

अपामार्ग

अथाऽऽपामार्गहोमं जुहोति, अपामार्गैव देवा दिक्षु नाष्ट्रा रक्षांस्यपामृज यदपामार्गहोमो भवति रक्षसामपहत्यै।।
-शतपथ ब्राह्मण 5.2.4.14
अपामार्ग के होम से राक्षसों अथवा प्रदूषणों का निवारण होता है।

अनेक वैज्ञानिकों व विद्वानों द्वारा यज्ञ पर शोध
1. यज्ञ की अग्नि पदार्थों को सूक्ष्म कर देती है, सूक्ष्मीकरण से पदार्थ की शक्ति असंख्य गुना बढ़ जाती है एवं औषधि का वह शक्तिशाली अंश उभर आता है जिसे कारणतत्व कहते हैं। स्थूल औषध की तुलना में सूक्ष्म के सामथ्र्य का अनुपात अत्यधिक बढ़ा चढ़ा होता है। -(हनीमैन के अनुसार)
2. सुगंधयुक्त पदार्थों को आग में जलाने से अनेक प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं, स्काॅटलैंड, आयरलैंड, दक्षिण अमेरिका में महामारी जैसी भयंकर रोग को दूर करने के लिए यह प्रथा प्रचलित रह चुकी है। -(प्रो. मैक्समूलर ‘फिजिकल रिलीजन’ पुस्तक में)
3. ईसा से पूर्व अरब में एक ऐसी चिकित्सा पद्धति प्रचलित थी, जो पूर्ण रूप से सुगंध (Aroma) द्वारा उपचार करने पर आधारित थी। जापान और चीन में होम को घोम कहते हैं और नित्य मंदिरों में घृत के साथ सुगंधित द्रव्य जलाकर भयंकर रोग दूर किए जाते हैं। -(इनसाइक्लोपीडिया आॅफ अल्टरनेटिव मेडिसिन एंड सेल्फ हेल्प में विस्तार पूर्वक वर्णन)
4. विभिन्न पदार्थों के जलाने से उत्पन्न धूम्रों के गुण – दोषों की जांच करके पता लगाया कि कतिपय वस्तुएं ऐसी हैं, जो अपने साधारण रूप की अपेक्षा जलने पर कहीं अधिक लाभदायक बन जाती हैं। जो वायु में छाए हुए हैजा, महामारी, क्षय, चेचक आदि के रोग- कीटाणुओं को नष्ट करती है। गन्ने की साधारण खांड की अपेक्षा मुनक्का, छुहारा, किशमिश आदि मधुर पदार्थों से जो गैस उत्पन्न होती है, उसमें ड्डमिनाश के अतिरिक्त पोषण का भी विशेष गुण है। -(रसायन शास्त्र के फ्रांसीसी विज्ञानवेत्ता डाॅ. त्रिले)
5. अनेक रोगों का सुगंध (Aroma) चिकित्सा द्वारा सरलता से उपचार किया जा सकता है। वे रोग हैं मुंहासे, झुर्रियां, सिबोरिया आदि चमड़ी के अनेक रोग, रक्ताभिसरण की शिथिलता, मोटापा, मांसपेशियों की कमजोरी, रोमेटिज्म, साइनोसाइटिस तथा मानसिक उदासी आदि। -(राॅबर्ट बी. टिसरेड ने ‘दा आर्ट आॅफ एरोमा थेरेपी’ नामक पुस्तक में)
6. सुगंधयुक्त रोगनाशक औषधियों के जलाने से महामारी, प्लैग और अनेक प्रकार के विषाणु जनित रोग दूर हो जाते हैं। अब ये मैं तथ्यों व प्रमाणों के आधार पर स्पष्ट रूप से कह सकता हूँ। -(कर्नल किंग, प्डै सेनेटरी कमिश्नर, मद्रास ने ‘ब्यूबोनिक प्लेग’ नाम की पुस्तक में)
7. सभी विद्वान् जानते हैं की स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म अधिक शक्तिशाली होता है। सूक्ष्म, स्थूल में प्रवेश कर सकता है। सोने का एक छोटा टुकड़ा मनुष्य खा ले तो उस पर कोई प्रभाव न होगा, पर उसी टुकड़े को सूक्ष्म करके भस्म बनाकर खाए तो प्रथम दिन से ही उसकी गर्मी अनुभव होगी और कुछ समय में चेहरे पर लाली और शरीर में शक्ति आ जाएगी। -(डाॅ. फुंदन लाल अग्निहोत्री की पुस्तक ‘यज्ञ चिकित्सा’)
8. जलती हुई खांड (शक्करद) के धुंए में वायु शुद्ध करने की बड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीघ्र नष्ट हो जाता है। -(फ्रांसीसी प्रो. टिलवर्ट)
9. मैंने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जला कर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुएं से टाइफाइड ज्वर के कीटाणु केवल आधा घंटे में और दूसरे रोगों के कीटाणु घंटे दो घंटे में समाप्त हो जाते हैं। -(डाॅ. टाटलिट)
10. घी जलाने से कृमि रोग का नाश हो जाता है। -(फ्रांसीसी डाॅ. हेफकिन, चेचक टीके के आविष्कारक)
11. मैंने कई वर्ष की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है, कि जो महारोग औषध भक्षण करने से दूर नहीं होते, वे वेदोक्त यज्ञों द्वारा (अर्थात् यज्ञ चिकित्सा से) दूर हो जाते हैं। -(कविराज पंडित सीताराम शास्त्री)
12. मैं प्रथम 25 वर्ष तक खोज और परीक्षण के पश्चात् क्षय रोग की यज्ञ द्वारा चिकित्सा सैकड़ों रोगियों की कर चुका हूं। उनमें ऐसे भी रोगी थे, जिनके क्षत (ब्ंअपजल) कई-कई इंच लंबे थे और जिनको वर्षों सैनिटोरियम और पहाड़ पर रहने पर भी अंत में डाॅक्टरों ने असाध्य बता दिया, पर वे यज्ञ चिकित्सा से पूर्ण निरोग होकर अब अपना कारोबार कर रहे हैं। -(डाॅ. फुंदनलाल अग्निहोत्री)
13. जब यज्ञ किया जाता है तो वातावरण में प्राण ऊर्जा के स्तर में वृद्धि होती है जो कि प्रयोगों में यज्ञ से पहले और बाद में मानव हाथों की किर्लियन तस्वीरों की मदद से भी दर्ज किया गया था। -(जर्मन डाॅ. माथियास फरिंजर)
14. अनाहत चक्र (Cardiac Plexus) पर अग्निहोत्र (यज्ञ) के प्रभावों का अध्ययन किया, जिसमें यज्ञ के बाद की स्थिति वैसी ही पाई गयी, जैसी की मानसिक या आध्यात्मिक उपचार के बाद होती है। -(डाॅ. हिरोशी मोटोयामा)
15. सुगंध चिकित्सा द्वारा बुढ़ापा रोका जा सकता है। -(श्रीमती मार्ग्रेट मोरी ने ‘द सीक्रेट आॅफ लाइफ एंड यूथ’ नामक पुस्तक में)

स्वामी दयानन्द जी की दृष्टि में यज्ञ
जो यज्ञ के धूम से शोधे हुए पवन हैं, वे अच्छे राज्य के कराने वाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो दुर्गन्ध आदि दोषों से भरे हुए अशुद्ध वायु है वे, सुखों का नाश करते हैं। इससे सब मनुष्यों को चाहिए कि अग्नि में होम द्वारा वायु की शु(ि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें।
जो मनुष्य यथाविधि अग्निहोत्र आदि यज्ञों को करते हैं वे, पवन आदि पदार्थों के शोधने हारे होकर सबका हित करने वाले होते हैं।
मनुष्य, नित्य सुगन्ध्यादि पदार्थों को अग्नि में छोड़-हवन कर, पवन और सूर्य की किरणों द्वारा वनस्पति, औषधि, मूल, शाखा, पुष्प, फलादिकों में प्रवेश कराके सब पदार्थों की शुद्धि कर आरोग्यता की सिद्धि करें।
मनुष्यों को चाहिए कि प्राण आदि की शुद्धि के लिए आग में पुष्टि करने वाले पदार्थ का होम करें।
विद्वानों को चाहिए कि इस संसार के सुख के लिए यज्ञ से शोधे हुए जल से और वनों के रखने से अति उष्णता (खुश्की) दूर करें। अच्छे बनाये हुए अन्न से बल उत्पन्न करें। यज्ञ के आचरण से तीन प्रकार के दुःख (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक) को निवार के सुख को उन्नति देवें। उन्होंने यजुर्वेद के अधिकांश मंत्रों में यज्ञ से जल शुद्धि का प्रतिपादन किया है। यथा-
यज्ञ के अनुष्ठान से वायु और जल की उत्तम शुद्धि तथा पुष्टि होती है वह दूसरे उपाय से कभी नहीं हो सकती। ‘जो मनुष्य, यज्ञादि से जलादि पदार्थों को शुद्ध सेवन करते हैं उन पर सखरूप अमृत की वर्षा निरंतर होती है।
ऋग्वेदमंत्र के भावार्थ में यज्ञ द्वारा ध्वनिप्रदूषण से बचने का संकेत किया है। यथा-
जो अग्नि में सुगन्धि आदि पदार्थों को होमते हैं, वे रोग और कष्ट के शब्दों से पीड़यमान नहीं होते।
हवन किया हुआ द्रव्य, दुर्गन्धादि दोषों का निवारण कर सब दुःखों से रहित सुखों को सिद्ध करता है जिससे दिनरात सुख बढ़ता है। इसके बिना कोई प्राणी, जीने को समर्थ नहीं हो सकता। इससे इसकी शुद्धि के लिए नित्य यज्ञ करें।
जनता नाम मनुष्यों का जो समूह है, उसी के सुख के लिए यज्ञ होता है और संस्कार किये द्रव्यों का होम करने वाला जो विद्वान् मनुष्य है वह भी आनन्द को प्राप्त होता है क्योंकि जो मनुष्य जगत् का जितना उपकार करेगा उतना ही ईश्वर की व्यवस्था से सुख प्राप्त होगा। इसलिए यज्ञ, अनर्थ दोषों को हटाकर जगत् में आनन्द को बढ़ाता है।
आर्यवीर शिरोमणि महाशय, ऋषि-महर्षि, राजे- महाराजे लोग बहुत सा होम करते और कराते थे। जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त देश रोगों से रहित एवं सुखों से पूरित था। अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाये।

वैदिक यज्ञ सूक्तियाँ

शतायुषा हविषाहार्षमेनम्।। -अथर्व. 3.11.4
यज्ञ तुझे सौ वर्ष तक आयुष्य देवें।

पृथवी च मे यज्ञेन कल्पताम्। -यजु. 18.13.18
पृथिवी को यज्ञ के द्वारा समर्थ बनाये।

पृथिवीं भस्म स्वाहेति। -मैत्रा. सं. 3.9.4
पृथिवी को भस्म से आपूरित करें।

कृषिश्च मे यज्ञेन कल्पताम्। -यजु 18.9
हमारी कृषि यज्ञ के द्वारा सामथ्र्यशाली होवें।

‘वृष्टिश्च मे यज्ञेन कल्पताम्। -यजु. 18.9
वृष्टि यज्ञ के द्वारा सामथ्र्यशाली होवें।

हविर्धनं अग्निशालं। -अथर्व. 9.3.1.7.11
प्रत्येक घर में होम करने का स्थान एवं यज्ञीय पदार्थ रखने का स्थान होना चाहिये।

यज्ञो मे आयुर्दधतु। -का.सं. 5.3
यज्ञ मुझे आयु धरण कराये।

यज्ञो वै सुतर्मा नौः। -ऐत.ब्रा.-1.13
यज्ञ ही सुखविस्तारक नौका है।

स्वर्गो वै लोको यज्ञः। -कौ.ब्रा.-14.1
यज्ञ ही स्वर्ग लोक है।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। -गीता 3.12
यज्ञ द्वारा बढ़ाये हुए देवतागण इष्ट-कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

मुखं वा एतद्यज्ञानां यदग्निहोत्राम्।। -शत.ब्रा.-14.3.1.29
यह अग्निहोत्रा यज्ञों का मुंह है।

घृतस्य धरा अभिचाकशीमि।। -यजु.-17.93
इस यज्ञ में अन्न आदि पदार्थों के साथ घी की धरा बहायें।

सर्वदेवत्यं वै घृतम्। -कौ.ब्रा.-21.4
घी सभी देवताओं का पोषक है।

इदं हविर्यातुधनान् नदी फैनमिवावहत्।। -अथर्व. 1.8.2
यज्ञ मंे होमीगई हवि रोग एवं प्रदूषण रूपी यातुधनों को वैसे ही विनष्ट कर देती है जैसे नदी, झागों को।

दूर्वा व्याधिविनाशय होमयेत्।। -अग्नि.-81.51
सर्व व्याधि नाशार्थ दूर्वा (दूब) का हवन करना चाहिये।

मृत्यु×जयो मृत्युजित् स्याद् वृद्धिः स्यात्तिलहोमतः।। -अग्नि.-81.51
तिल के द्वारा हवन करने से मानव मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।

होतृषदनं हरितं हिरण्ययम् -अथर्व.-7.99.1
यज्ञकर्ता का घर सभी प्रकार के ऐश्वर्यों से भर जाता है।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। -गीता-3.12
यज्ञ से तृप्त देवगण यजमान की इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। -गीता-3.13
यज्ञ शेष अन्न को खाने वाले यजमान पापों से मुक्त हो जाते हैं।

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। -गीता-4.31
यज्ञ से बचे अमृत को खाने वाले यजमान परमात्मा को प्राप्त होते हैं।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्। -गीता-18.5
यज्ञ दान व तप ये कर्म मनुष्यों को पवित्र करने वाले हैं।

यज्ञस्य प्राविता भव। -ऋ.-3.21.3
तू यज्ञ का रक्षक बन।

अग्निर्म दुरिष्टात् पातु, अग्निः खलु वै रक्षोहा।। -तैत्ति. सं. 1.3.6.1.6.1.4.6
अग्नि दोषों से छुड़ाने वाला तथा रोगाणुओं का संहार करने वाला है।

अग्निरू सर्वेषां पाप्मनामपहन्ता। -शत.ब्रा. 7.3.2.16
अग्नि समस्त दोषांे का विनाशक है।

अग्निर्वै धूमो जायते, धूमाद् अभ्रम्, अभ्राद् वृष्टिः। -श.ब्रा. 5.3.5.1.7
अग्नि से धुआं उत्पन्न होता है ध्ुएं से मेघ तथा मेघ से वृष्टि की उत्पत्ति होती है।

अग्निर्हविः शमिता सूदयाति।। -ऋ.-7.2.10
अग्नि हवन किये द्रव्य को छिन्न-भिन्न करती है।

अग्निर्दिवि हव्यमाततान…।। -ऋ.-10.80.4
यह अग्नि ही हव्यद्रव्यों को द्युलोक में फैलाती है।

वसोः पवित्रमसि। -यजु.-1.2
यज्ञ शुद्धि का हेतु है।

यज्ञो वा आयुः। -ता.महाब्रा. 6.4.4.
यज्ञ ही जीवन है।

ईजानाः स्वर्गं यान्ति लोकम्। -अथर्व.-18.9.2
यज्ञ करने वाले सुखमय लोक को पाते है।

तस्मादपत्नीकोऽप्यग्निहोत्रमाहरेत्।। -ऐत.ब्रा., 7.9
पत्नी के बिना भी अकेले अग्निहोत्र करे।

यज्ञं मधुना मिमिक्षतम्। -ऋ.-1.34.3
शहद से यज्ञ को सींचे।

होमं समारभेत् सर्पिर्यवब्रीहितिलादिना। -यज्ञमीमांसा
तिल, जौ, चावल और घृत से हवन करे।

सप्त ते अग्ने समिधा। -यजु. 17.79
यज्ञ के लिये सात (पीपल, पलास आदि) समिधाओं का प्रयोग करें।

अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः। -ऋग्. 1.164.34
यह यज्ञ भुवन का केन्द्र है।

गृहं गृहमुपतिष्ठाते अग्निः। -ऋग्. 1.124.11
घर-घर में यज्ञाग्नि पहुँचे।

सहस्रंभरः शुचिजिह्नो अग्निः। -ऋग्. 2.9.1
पवित्र ज्वाला वाली यज्ञाग्नि हजारों लाभ पहुँचाता है।

यज्ञेन गातुमप्तुरो विविद्रिरे। -ऋग्. 2.21.5
कर्मपरायण लोग यज्ञ से सन्मार्ग की दिशा पाते हैं।

विप्रो यज्ञस्य साधनः। -ऋग्.3.27.8
बुद्धिमान् मनुष्य यज्ञ का साधक होता है।

निषीद होत्रमृतुथा यजस्व। -ऋग्. 10.98.4
यज्ञ में बैठ ऋतु के अनुकूल यज्ञ कर।

ऊध्र्वोऽध्वर आस्थात्। -यजु. 2.8
यज्ञ सबसे ऊपर स्थित कर्म है।

मेधायै मनसेऽग्नये स्वाहा। -यजु. 4.7
मेधा और मनोबल पाने के लिए हम अग्नि में आहुति देते हैं।

स्वर्यन्तु यजमानाः स्वस्ति। -यजु. 17.39
यजमान लोग स्वस्ति तथा मोक्ष प्राप्त करें।

तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना। -यजु. 20.25
वह देश पुण्यवान् है जहाँ विद्वान् जन अग्निहोत्र करते हैं।

समिद्धो अग्निः सुपुना पुनाति। -अथर्व. 12.2.11
प्रज्वलित यज्ञाग्नि अपनी सुपावकता से वायुमण्डल को पवित्रा करती है।

मन्त्रो गुरुः पुनरस्तु। -ऋ. 1.147.4
मन्त्र ही सर्वत्र गुरु है।

दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते। -ऋ. 1.124.6
दक्षिणा देने वाले मोक्षसुख पाते हैं।

यज्ञ श्लोगन

यज्ञ की यह शुद्ध हवा।
सब रोगों की है दवा।।1।।

जो तुम चाहते हो रोगों से छुटकारा।
तो लो नियमित यज्ञ का सहारा।।2।।

यही हमारी संस्कृति, यही हमारी पहचान।
आओ करें मिल यज्ञ सब, हो ऋषिराष्ट्र सम्मान।।3।।

जब होगा योग-यज्ञ और ध्यान।
तभी बनेगा यह भारत महान्।।4।।

हो संकल्प योग यज्ञ का रहे न दुःख से मारा।
हो समृद्ध तन-मन-धन से ऐसा हो भारत हमारा ।।5।।

न होता प्रदूषण और रोगों का वार।
करते यदि यज्ञपेड़-पौधों का विस्तार।।6।।

भवन बन रहे हैं, पतन हो रहा है।
वो धरा-जमीं पावन है, जहां हवन हो रहा है।।8।।

नित्य यज्ञाग्नि का आधान जहां
धरती का है स्वर्ग वहां।।9।।

विश्व शांति का एक नारा।
यज्ञ से होगा जग उजियारा।।10।।

बिन बाती न दीप जले, होवे न देहली उजियारा।।
ऐसे ही बिन योग-यज्ञ के, होवे न दुःख छुटकारा।।11।।

न करो पशु-पक्षी और प्रकृति की हानि।
जियो और जीने दो यही यज्ञ की वाणी।।12।।

यज्ञ करना टाइम वेस्ट नहीं।
अपितु टाइम बेस्ट है।।13।।

दमा-खांसी-कोरोना-कैंसर, रोग हो रहें हैं रोज।
योग कर तू हवन रचा, स्वस्थ काया बढ़ेगा ओज।।14।।

वेदों में बताया यही विधान।
यज्ञ से होगा रोग निदान।।15।।

यज्ञ की यह शुद्ध राख।
अनेक रोगों की है खुराक।।16।।

प्रकृति हमारी जननी है।
यज्ञ से रक्षा करनी है।।17।।

पंच यज्ञों में जो है श्रेष्ठ, होता है जिससे सब रोग न।
सकल जग के प्राणमय भैषज्य, महर्षि कहते जिसे देवयज्ञ।।18।।

इदन्न मम है जिसकी आत्मा, स्वाहा है जिसका प्राण।
ऐसे दिव्य वचनों से, बढ़ती है यज्ञ की शान।19।।

आहार-विहार-विचार और, शुद्ध होता है नित व्यवहार।
ऐसे देवों में देवयज्ञ का, आओं मिलकर करें विस्तार।।20।।

न खर्चे का डर न वक्त का फेर।
तो यज्ञ करने में क्यूं करता है देर।।21।।

अनेकता में एकता की पहचान। यह यज्ञ-अभियान।।22।।

यज्ञ-वृक्ष की जब करोगे रक्षा।
तब ही बनेगा जीवन अच्छा।23।।

न करो और प्रदूषण करने की भूल।
यज्ञ से जुड़ों यह है संस्कृति का मूल।।24।।

यज्ञ है हमारी भारतीय संस्कृति।
स्वार्थ साधना में न करे विस्मृति।।25।।

बंजर धरती की यही पुकार।
यज्ञ करके करो श्रृंगार।।26।।

सुगंध-मिष्ठ-पुष्टिवर्धक, है रोगनाशक चार जिसमें हवि।
ऐसे दिव्य तेज पुंज को, कहते अग्निहोत्र जिसे कवि।।27।।

जब तक भारत का नाम रहेगा।
यज्ञ-मंत्रों का गुणगान रहेगा।।28।।

लो हवन में श्वास गहरा।
सुखमय जीवन हो सुनहरा।।29।।

सब लोगों की यही पुकार।
यज्ञमय हो सारा संसार।।30।।

योग-यज्ञ से मिलती है विमल मति।
न करो भेदभाव न अभिमान अति।।31।।

यज्ञ हमारी परम्परा, भूल गयें है आज।
करे और कराये इसे, है रोगों का इलाज।।32।।

करो यज्ञ की तैयारी।
नहीं तो और फैलेगी महामारी।।33।।

है कलुषित जल-वायु भी, थी कभी जीवन-दायिनी। रक्षक ही बन बैठा भक्षक, नहीं किसी की है मानी।।
अभी समय है संभल जाओ, ज्यादा न हुई कोई हानि। यज्ञ करो पेड़ लगाओ, यही वेदऋषि की वाणी।।34।।

होतें यज्ञ और वृक्ष जहां।
रहतें स्वस्थ सब है वहां।।35।।

कर रहे रोग जीवन का हरण।
आओ लें यज्ञ की हम शरण।।35।।

मंगल-कामना-2

सुखी बसे संसार सब, दुखिया रहे न कोय।
यह अभिलाषा हम सब की, भगवन्! पूरी होय ।।1।।
विद्या-बुद्धि-तेज-बल, सब के भीतर होय ।
दूध्-पूत-धन-धान्य से, व´िचत रहे न कोय ।।2।।
आपकी भक्ति प्रेम से, मन होवे भरपूर ।
राग-द्वेष से चित्त मेरा, कोसों भागे दूर ।।3।।
मिले भरोसा आपका, हमें सदा जगदीश ।
आशा तेरे धाम की, बनी रहे मम ईश ।।4।।
पाप से हमें बचाइये, करके दया दयाल ।
अपना भक्त बनाकर, सबको करो निहाल ।।5।।
दिल में दया उदारता, मन में प्रेम अपार।
हृदय में धीरज वीरता, सबको दो करतार ।।6।।
नारायण प्रभु आप हो, पाप के मोचन हार।
क्षमा करो अपराध सब, कर दो भव से पार ।।7।।
हाथ जोड़ विनती करूँ, सुनिये कृपा-निधान ।
साधु-संगत सुख दीजिये, दया नम्रता दान ।।8।।

यज्ञ-प्रार्थना-3

ऊपर को उठ उठकर अग्नि करती हमें इशारा ।
जीवन में उफपर को उठना है कत्र्तव्य हमारा ।।
उद्बुध होते देख अग्नि को, हम भी उद्बुध होवे ।
अपनी जीवन ज्योति जलाकर, अन्धकार को खोवे ।।
ऐसा जीवन होवें जिनका, वही सभी को प्यारा ।
जीवन में ऊपर को उठना………..
ऊपर को उठ उठकर अग्नि……..
अग्नि में जो चीज पड़े, जग में सुगन्धि पफैलावे ।
हम भी दुर्गुण दूर हटा, जीवन में सद्गुण लावे ।
जीवन दिव्य सुगन्धित जिसका, वही प्रभु को प्यारा ।।
जीवन में ऊपर को उठना………..
ऊपर को उठ उठकर अग्नि……..
जीवन भी वह क्या जीना है, अपने लिये जो जीता ।
जीवन सफल उसी का होवे, परहित में जो जीता ।
परहित जीना परहित मरना, यही है धर्म हमारा ।।
जीवन में ऊपर को उठना………..
ऊपर को उठ उठकर अग्नि……..

विश्व-कल्याण यज्ञ से-4

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं, भगवान् यज्ञ से।।
ऋषियों ने ऊँचा माना है स्थान यज्ञ का।
भगवान् का यह यज्ञ है भगवान् यज्ञ का ।।
पाता है देवलोक को इन्सान यज्ञ से ।।
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जो कुछ भी डालो यज्ञ में खाते हैं अग्निदेव।
बादल बनाकर पानी बरसातें हैं अग्निदेव।।
पैदा अनाज करते हैं भगवान् यज्ञ से।।
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
होता है कन्या-दान भी, हाँ इसके सामने।
शक्ति व तेज है भरा इसके शुभ नाम में।।
पूजा है इसको कृष्ण ने, भगवान् राम ने ।
मिलती है शक्ति, कीर्ति, सन्तान यज्ञ से।।
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
इसका पुजारी जो हो, पराजित न हो कभी।
दुःख और भय से डरने की आदत न हो कभी।।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से।।
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
चाहे अमीर हो कोई, चाहे गरीब है।
जो यज्ञ नित्य करता है वह खुशनसीब है।।
उपकारी मनुष्य बनता है महान् यज्ञ से ।।
होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।

करके ये यज्ञ मेरा-5

करके ये यज्ञ मेरा, सौभाग्य खुल गया है।
जीवन की हर घड़ी में, आनन्द घुल गया है।।
करके ये……………
पाया है मैंने सब वो, चाहते हैं जिसको सारे।
आरोग्य शान्ति मन की, है मुझको बहुत प्यारे।
बोला जो मैंने स्वाहा, हर पाप धुल गया है।।
जीवन की हर………..
दुर्भाव-दुर्गुणों से, मैंने है मुक्ति पाई।
वेदों की वाणी सुनकर, जीने की युक्ति आई।
ऐसी है यज्ञ नौका, तर सारा कुल गया है।।
जीवन की हर…………..
करते हैं नित्य यज्ञ, क्योंकि ये धरम हमारा।
दाता ने जो दिया है, अर्पित उसी को सारा।
कुछ माँगने से पहले, सब कुछ ही मिल गया है।।
जीवन की हर…………..
करके ये यज्ञ……………।

‘यज्ञ’-एक चिकित्सा विज्ञान

‘यज्ञ’- एक नैनो टेक्नोलाॅजी
(Yagya, Nano Technology)
वर्तमान समय नैनो टेक्नोलाॅजी का समय है ऐसा कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि नैनो टेक्नोलाॅजी के माध्यम से पदार्थों को तोड़ कर के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम कर उसके अन्दर प्रसुप्त शक्तियों को उजागर करके थोड़े पदार्थ से अनन्त असीम लाभ प्राप्त करने की एक अनोखी विधा प्राचीन काल से ही चली आ रही है, वह है ‘यज्ञ’। आइये जानते है कैसे?
आयुर्वेद में सामान्य रूप से बीमार व्यक्ति को वटी, चूर्ण, आसव, अरिष्ट आदि औषध देकर के नैरोग्य के लिए प्रयास किया जाता है। लेकिन असाध्य कोटि में जब रोग पहुंच जाता है या फिर वटी आदि दवाओं का प्रयोग प्रभाव नहीं दिखाता है, उस समय आयुर्वेद के वैद्य रस-रसायन विद्या अर्थात् ‘नैनो टेक्नोलाॅजी’ का प्रयोग जिसको सामान्य रूप से भस्म कहा जाता है, उसका प्रयोग लेते है, व असाध्य कोटि के रोगियों को भी तुरन्त आरोग्य प्रदान करने का कार्य संभव या सम्पन्न हो पाता है! क्यो?
क्योंकि सामान्य रूप से ली गयी औषध ठोस या द्रव रूप में है, जो नैनो नहीं है अर्थात् उसके अन्दर छिपी प्रसुप्त शक्तियाँ पूर्णरूप से जागृत अवस्था में नहीं है। तो उस कार्य को अर्थात् प्रसुप्त अवस्था में स्थित शक्तियों को उभारने के लिए जिस रोग के लिए जिस औषध द्रव्य की आवश्यकता होती है, उसको पहले जलाकर भस्म बना दिया जाता है। अर्थात् उतनी सूक्ष्म की हथेली पर रखकर फूक मारे तो उड़कर के वायुभूत हो जाये ऐसा सूक्ष्म बना दिया जाता है। फिर भी हम उनकी शक्ति को पूर्णतः उद्भूत नहीं कर पातें, अतः तब उस भस्म को खरल करके उनके कणों (Perticals) को तोड़ा जाता है। बार-बार उस पदार्थ को कई दिनों तक निरन्तर तरल कर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम रूप में पार्टीकलों को तोड़ दिया जाता है और जैसे-जैसे अधिक तरल किया जाता है उतना ही पार्टीकल टूटता है, उतना ही ज्यादा सूक्ष्म होता जाता है व जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व सूक्ष्मतम पदार्थ होता जाता है, उतना ही उसके अन्दर प्रसुप्त शक्ति उद्भूत होती चली जाती है और एक ऐसी स्थिति में आ जाती है, जो सबसे शक्तिशाली पदार्थ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। अतः वैद्य उस औषध को कुछ चंद ग्राम में देता है व उसकी भी साठ पुड़ियाँ बनाकर एक माह के लिए देता है तथा वह इतना शक्तिशाली पदार्थ के रूप में आ जाता है कि जब कोई दवाई काम नहीं करती या मरणासन असाध्य कोटि के रोगी हो, उसको भी तुरन्त स्वस्थ कर देती है। ऐसी अद्भुत शक्ति में परिणित हो जाती है यह है, हमारे आयुर्वेद शास्त्र कि नैनो टेक्नोलाॅजी।
इसी प्रकार होम्योपैथी को देखे तो मात्र 200 साल पुरानी पैथी है, वह भी आज समाज में बढ़-चढ़ कर लोकप्रिय हो रही है, उसका तो मूल सिद्धान्त ही नैनो टेक्नोलाॅजी है। होम्योपैथी मंे भी जिस पदार्थ कि हमें आवश्यकता होती है, उस गुण, कर्म, स्वभाव वाले पदार्थ को आसुत जल (Distilled water) के माध्यम से पदार्थ को नैनो किया जाता है, सूक्ष्म किया जाता है। वह इतना सूक्ष्म हो जाता है, कि इलेक्ट्राॅन के रूप में कन्वर्ट हो जाता है, जिसका सेवन करने पर उसी समय तुरन्त परिणाम देने वाली हो जाती है, क्योंकि पदार्थ नैनो हो गया और नैनो में शक्ति होती है।
उसी प्रकार ‘यज्ञ’ भी पूर्णतः व सरलतम तरीके से पदार्थों को नैनो करने कि अमोघ विधा व विद्या है। धरती पर जितने भी पदार्थ पाये जाते हैं, उसमें से सबसे सूक्ष्म से सूक्ष्मतम कोई पदार्थ है, तो वह है ‘अग्नि’। धरती में तीन रूपों में पदार्थ पाये जाते हंै- ठोस, द्रव्य और गैस। इनमें ठोस पदार्थ कठोर से कठोर पत्थर को ले और उस पत्थर के अन्दर पानी डालना चाहे तो नहीं डाल सकते, हवा को उस पत्थर के अन्दर डालना चाहे तो नहीं डाल सकते, इसी प्रकार कील आदि उस कठोर व ठोस पत्थर में डालना चाहे तो नहीं डाल सकते अर्थात् ठोस व ठोसतम पत्थर के अंदर कोई जगह नहीं है, उसके अन्दर कोई भी ठोस-द्रव्य-गैस तीनों में से किसी का भी प्रवेश नहीं करा सकते। कोई उसके अंदर प्रवेश पायें ऐसी सम्भावना तक नहीं है। लेकिन उस कठोर पत्थर को अग्नि के ऊपर रख दे, तो वह अग्नि उस पत्थर के अणु-परमाणु के अंदर तक प्रवेश पा जाती है। इसी प्रकार द्रव पदार्थ, जल तथा गैस रूप पदार्थ वायु के भी अणु-परमाणु के अन्दर अग्नि प्रवेश पा जाती है। अर्थात् धरती पर सबसे सूक्ष्म कोई पदार्थ है, तो वह है अग्नि। उस अग्नि का एक विशेष स्वभाव है, कि उसके सम्पर्क में जो भी पदार्थ आता है, उसको अपने जैसा बना लेती है अर्थात् सूक्ष्मतम बना देती है। जैसे अग्नि में समिधा (Wood) की आहुति देते हैं, तो वह अग्निस्वरूप हो जाती, इसी प्रकार घी (Ghee) व जड़ी-बूटियों को अग्नि में आहुत करते हैं, तो वह भी उतना ही सूक्ष्म हो जाती है और जो पदार्थ जितना ज्यादा सूक्ष्म होता है, उतना ही ज्यादा शक्तिशाली व बड़ा परिणाम देने वाला हो जाता है।
अतः अग्नि में जो भी पदार्थ डाला जाता है वह रूपान्तरित हो जाता है। उसका नाश नहीं होता (सर्वथा अभाव नहीं होता) अपितु कण (पार्टीकल) वायु (Gas) एवं ऊर्जा (Energy) के रूप में रूपांतरित-परिवर्तित हो जाता है। नाश शब्द ‘णश अदर्शने’ धातु से अदर्शन अर्थ में है अर्थात् पहले हमें यज्ञ का सामान दिखायी दे रहा है जैसे- घी, समिधा, जड़ी-बूटी आदि, जब उसे अग्नि में आहुत कर देते है, तो वह अग्नि जैसा ही सूक्ष्म हो जाता है। (कण, गैस व ऊर्जा में रूपांतरित हो गया), उसका सर्वथा अभाव नहीं हुआ। जैसे हमारे पास एक पात्र में जल रखा है, उसे अग्नि पर रख दिया (सौ डिग्री पर गर्म करते हैं) तो वह वाष्प बन जाता है, वह पात्र खाली हो जाता है। पात्र में जो पानी दिख रहा था, वह अब नहीं दिख रहा है। क्या हम कह पायेंगे कि यह पानी नष्ट हो गया, नहीं क्योंकि वह वाष्प रूप में रूपातंरित हो गया, उसका सर्वथा अभाव नहीं हुआ। इसी प्रकार हर कोई पदार्थ रूपांतरित होता है, उसका सर्वथा अभाव नहीं होता है, यही नाश शब्द का शाब्दिक व वास्तिवक अर्थ है। इसी को स्पष्ट करते हुए ‘महर्षि कपिल’ ने सांख्यदर्शन में ‘नाशः कारणलयः’ -(1.86) सूत्र दिया है- जिसका का अर्थ है- अपने कारण में लय हो जाना अर्थात् अनन्त ऊर्जा में रूपांतरित हो जाना, जो ऊर्जा सबसे ज्यादा प्रभावित परिणाम देने वाली होती है। हमारे स्थूल शरीर के साथ मन पर तो उसका चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता ही है, लेकिन उसके साथ-साथ हमारे सूक्ष्म शरीर एवं पंच-कोश अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय पर भी चिकित्सकीय प्रभाव पड़ता है एवं पंचप्राण तथा पंच उपप्राणों का पोषण व अष्टचक्रों-मूलाधार से लेकर सहस्रार पर्यन्त प्रभावी रूप से सत्व का संचार कर मानवीय चेतना का उत्कर्ष कर अतिमानस चेतना से युक्त करने का कार्य भली प्रकार ‘यज्ञ’ चिकित्सा से सम्भव होता है।

वायुरूप आहार से स्वास्थ्य-
जीव मात्र को जीवन जीने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, वह ऊर्जा हम आहार के माध्यम से प्राप्त करते हैं। जिसे तीन रूपों में लेते हैं- ठोस, द्रव्य एवं गैस। इन तीनों आहारों से मिलने वाली ऊर्जा को देखें तो गैस रूप में हम सर्वाधिक ऊर्जा प्राप्त करते हंै। क्योंकि हम दिन में दो से तीन बार भोजन करते हैं, जिसमें ठोस रूप में रोटी, चावल आदि एवं द्रव्यरूप आहार के रूप में दिन में 5 से 10 बार सामान्य रूप से जल लेते हैं तथा गैस रूप आहार के रूप में वायु को ले रहे हंै- जिसे खाते, पीते, उठते, सोते हर समय (चैबिस घण्टे) ले रहे हैं।
इससे यह सिद्ध होता है कि गैस रूप आहार (Air) हमारे तीनों आहारों में सर्वाधिक लिये जाने वाला आहार है। इसी प्रकार उस आहार का महत्व (Importance) देखे तो भी वायु रूप आहार ही है। जैसे हम भोजन रूप ठोस आहार न ले तो भी दो से तीन महीने जीवित रह सकते हैं, इसी प्रकार द्रव्य रूप आहार न लेने पर हम दो से तीन सप्ताह जीवित रह सकते है। परन्तु वायु (Air) रूप आहार न ले तो हमारा दो से तीन मिनट भी जीवित रहना सम्भव नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे तीनों आहारों में सबसे ज्यादा व महत्वपूर्ण आहार वायु ही है।
आयुर्वेद ग्रंथों में ऋतुओं के आधार पर शरीरों में वात, पित्त एवं कफ दोष बढ़ते-घटते रहते हैं, जिसका सीधा सम्बंध वायु से है। ग्रीष्मऋतु में वायु-मण्डल गर्म हो जाता है अर्थात् उस समय पित्त दोष बढ़ जाता है। उसी प्रकार वर्षाऋतु में वात व शीत ऋतु में कफ दोष बढ़ जाता है।
वहीं वायु हमारे आहार का सबसे ज्यादा व सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण हमारे शरीरों में भी वात, पित्त व कफ दोष बढ़ते व घटते रहते हंै। जैसे आयुर्वेद गं्रथों में ठोस रूप भोजन में जिस प्रकार रूक्ष भोजन वात को, उष्ण भोजन पित्त को व स्निग्ध तथा शीतल भोजन कफ दोष को बढ़ाते हंै, वैसे ही वायु रूप आहार में भी जानना चाहिए।
अतः ऋतु अनुसार जड़ी-बूटियों से यज्ञ करने से वायुमण्डल में वात, पित्त एवं कफ दोष संतुलित हो जाते हैं व संतुलित दोषमुक्त वायु में रहने से शरीरों में वात-पित एवं कफ दोष संतुलित हो जाते हंै। जिससे हमें स्वास्थ्य लाभ विशेष रूप से प्राप्त होता है।
आयनीय चिकित्सा (Iontherapy)
हम जिस वायु के समुद्र में श्वास लेते हंै, उसमें दो प्रकार के धूलि कण (Ion) से हमारा सामना होता हंै- प्रथम ऋण आवेशित कण ऋणायण (Anion), दूसरे धन आवेशित कण धनायन (ब्ंजपवद)। ऋणायण से युक्त वायु प्राणधारी जीव मात्र के लिए विशेष रूप से स्वास्थ्य लाभ देने वाली होती है। झरनें, नदी के तट, समुद्रीय तट, वन, पर्वतीय क्षेत्र तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ऋणायन की मात्रा पर्याप्त पायी जाती है। इसी कारण लोग वायु परिवर्तन के लिए इन स्थानों पर जाना पसंद करते हंै व उस वायुमण्डल में स्वास्थ्य लाभ भी बहुत ही शीघ्र होता है। जिसको सामान्य भाषा में ‘आयनिक थैरेपी’ कहते हैं।
जहां पर नियमित रूप से यज्ञ होता है, वहाँ ऋणायन की मात्रा 200 से 400 आयन प्रति सेमी. की मात्रा में पायी जाती है। इससे यह सिद्ध होता है कि हम भी अपने घर के वायुमण्डल को झरने, नदी, जंगल व पहाड़ी क्षेत्र के वायुमण्डल जैसा बनाना व विशेष स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करना चाहते हंै, तो प्रतिदिन यज्ञ करंे।
इसी प्रकार जिस वायु में धन आवेशित कणों का आधिक्य हो, उस वायु में रहने से स्वास्थ्य हानि होती है। जहां भीड़भाड़ वाले, प्रदूषण भरे शहरी इलाकांे में व औद्योगिक क्षेत्रों में इन कणांे की भरमार रहती है, वहां लोगों का स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है तथा रोगी व्यक्ति को वहाँ सभी प्रकार की सुविधा-साधन व उपचार आदि के रहते हुए भी ठीक होने में लम्बा समय लगता है।
इसी तथ्य को एक वैज्ञानिक अल्बर्ट कुर्जर ने भी शोध-परिक्षणों से सिद्ध कर बताया है, कि धनायन से युक्त वायु में रहने से ‘ब्लड सिरोटीन’ की मात्रा बढ़ जाती है। जिसके परिणाम-स्वरूप स्वास्थ्य की हानि तथा रोगी को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होने में बहुत कठिनाई होती है तथा ऋणायन से युक्त वायुमण्डल में रहने से ‘ब्लड सिरोटीन’ की मात्रा में भारी मात्रा में कमी आती है। जिससे स्वास्थ्य लाभ विशेष रूप से प्राप्त होता है तथा रोगी को अपने रोग से निजात पाने में तत्काल परिणाम प्राप्त होते हैं।

रोगजनक सूक्ष्मजीव-नाशी (Mircobial Killer)
यज्ञाग्नि में जब औषधीय द्रव्यांे एवं गोघृत की आहुति देते हैं तो उसके जलने पर एथिलीन-आॅक्साईड, प्रोपलीन-आॅक्साईड से लेकर अनेक प्रकार की गैसों का निर्माण होता है। जिन गैसों के प्रभावों से हानिकारक बैक्टिरीया, फंगस एवं वायरस आदि नष्ट हो जाते हंै। जिसके कारण होने वाली अनेकों बीमारियां होगी ही नहीं तथा यदि हो भी गयी हंै, तो इस यज्ञ-गैसों के सम्पर्क में आने से वे जीव नष्ट हो जाते हंै व उसके कारण हुई बीमारी का भी अंत हो जाता है। जो कि वर्तमान समय में पूरी दुनिया में इन सूक्ष्म-जीवों के कारण होने वाली बीमारियों से करीब दो करोड़ लोग मौत के मुख में समा जाते हैं, जिसे इस छोटे से यज्ञ को अपनाने से बचाया जा सकता है।
यह यज्ञ चिकित्सा के कई पहलुओं में एक महत्वपूर्ण पहलु है। जोकि वर्तमान माॅडर्न साइंस से भी सिद्ध हो चुका है, कि ‘यज्ञ’ से (Communicable Disease) सूक्ष्म जीवों द्वारा उत्पन्न बीमारियों को खत्म किया जा सकता है।
यज्ञाग्नि के ताप, रंग एवं रश्मि (त्ंल) द्वारा चिकित्सा-
यज्ञ हमारे घर का सूर्य है। जैसे आजकल सूर्य-चिकित्सा का प्रचलन चल रहा है, उसमें सूर्य की धूप का सेवन तथा कुछ विशेष कलर कि बोतलों में जल भरकर सूर्यरश्मि मंे रख उस जल का पान करने से अनेक रोगों की चिकित्सा की जाती है वैसे ही जब यज्ञ करते हंै, तो उस दौरान यज्ञाग्नि के दर्शन करने से उसके ताप व रश्मियाँ जब हमारे शरीर पर पड़ते हैं, तो उससे हमारे शरीर पर अद््भुत रूप से चिकित्सीय प्रभाव पड़ता है। जिसके कारण अनेक रोगों से बचा व हो जाने पर उसे दूर किया जा सकता है।

कर्माशय जनित रोगों की यज्ञ से चिकित्सा-
यज्ञ को करने से सबसे ज्यादा पुण्यों की प्राप्ति होती है, अतः यज्ञ को पुण्यों की कृषि भी कहा जाता है। उन्हीं पुण्यों के आधार पर जाति, आयु एवं भोग इन तीनों की प्राप्ति होती है। हम जिस वर्तमान जीवन को जी रहे हैं, वह भी पूर्वकृत् पुण्यापुण्य कर्माशय का प्रतिफल है। यदि वही पुण्य कर्माशय दुर्बल हो, तो उसके परिणाम स्वरूप आयुर्वेद आदि ग्रंथों में ‘कुष्ठ’ आदि अनेकों बीमारियां बतायी हैं, जो गलत कर्माशय के कारण होती है तथा श्राप, बद्दुवा या अभिचार आदि से जनित असाध्य (Chronic) व दुष्ट रोगों व परिणामों की चिकित्सा भी ‘यज्ञ’ ही बतायी गई है। इसी प्रकार ‘मीमांसा दर्शन’ में भी बताया है संतान उत्पत्ति अर्थात् संतान-सुख की प्राप्ति के लिए जो कर्माशय की अपेक्षा है, वह न होने के कारण कई लोग संतान सुख से वंचित हो जाते हैं, तो उसके उपाय के रूप में भी पहले हम यज्ञ-यागादि कर्मों को कर अपने पुण्य कर्माशय को समर्थ करें व उसके समर्थ होने से हमें संतान-सुख अर्थात् सुख भोगों की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार अनेक असाध्य एवं गम्भीर बीमारियों से मुक्ति तथा सुख विशेष की प्राप्ति ‘यज्ञ’ चिकित्सा से भली प्रकार सिद्ध होती है।

भस्म/भभूत (Ash) से चिकित्सा-
यज्ञ शेष भस्म एक बहुमूल्य औषधि का कार्य करती है। इसीलिए प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि द्वारा भस्म से तिलक लगाना, पूरे शरीर पर भस्म लगाना तथा उसके दर्शन या उपदेश के लिए जाने पर प्रसाद के रूप में भस्म प्रदान करते थे और अनेक लोग बीमारियों की समस्या लेकर ऋषियों के शरण में जातें, तो उनको भी यही यज्ञ की भस्म देते व पानी के साथ लेने को कहते थे जिससे लोग ठीक भी हुआ करते थे।
छोटे बच्चे भी जब धूप के समय में खेलने के लिए घर से बाहर जाते तो उस समय मातायंे उनकी जिह्ना पर थोड़ी मात्रा में भस्म लगाकर भेजा करती थी। जिससे बच्चों का स्वास्थ्य विशेष रूप से बना रहता था।
उपरोक्त बातों को सामान्य व्यक्ति श्रद्धा या अज्ञानतावशात् मान सकता है, पर आज साइंस ने यह सिद्ध कर दिया है, कि भस्म के अन्दर एण्टी बैक्टीरियल, एण्टी फंगल आदि कई प्रोपर्टी होती है। जो कार्य आज हम साबुन, सेनेटाईजर से जीवों से बचाव के लिए प्रयोग करते हैं, वे प्राकृतिक रूप से भस्म में पायें जाते हैं। अतः शरीर पर रहने वाले बैक्टीरियल आदि से बचाव के लिए शरीर पर भस्म लगाया करते थे। आज साबुन आदि का प्रयोग करने के बावजूद भी करोड़ों लोग रोग से मर जाते हंै। इसी प्रोपर्टी के कारण भस्म का बर्तन (पात्र) आदि की सफाई के रूप में प्रयोग किया जाता रहा।
यज्ञ की भस्म के प्रयोग से कई प्रकार के चर्मरोगों से छुटकारा मिलता है तथा भस्म के अन्दर सौन्दर्य-वर्धक भी विशेष गुण होने से आज विदेशों में क्रिम-पाउडर आदि सौन्दर्य वर्धक प्रोडक्ट बिकने लगे हंै।
भस्म से कील, मुहासों से लेकर पुराने घाव भी ठीक हो जाते हंै तथा निरन्तर इसके प्रयोग से शरीर में दाग भी नहीं बचते अर्थात् चर्म को ठीक रखने के लिए ‘भस्म’ वरदान रूप औषध है।
भस्म को थोड़ी मात्रा में पानी मंे मिलाकर कुछ घण्टे छोड़ देने के बाद उस पानी के अन्दर बैक्टीरिया आदि रोगाणु नष्ट हो जाते हैं तथा उस पानी का पी.एच. लेवल आदि को भी मेंटेन करता है, साथ ही उस जल को Energetic and Medicated बनाने का कार्य करता है। इस पानी का पेय-जल रूप में प्रयोग करने से तथा जल के साथ कुछ मात्रा में भस्म का सेवन करने से ‘ब्लड आॅक्सिजन’ बढ़ने से लेकर कई प्रकार कि एलर्जी, डेफिशिएन्शी आदि बीमारियों को ठीक करने में चमत्कारी ढंग से परिणाम दिखाती है।
जिन बातों को माॅडर्न साईंस ने भी सिद्ध किया तथा यहाँ तक बताया है कि यदि इस भस्म का होम्योपैथिक विधि से तैयार कर सेवन किया जाये, तो एलोपैथिक दवाईयों के दुष्प्रभाव है, उनसे भी छुटकारा पाया जा सकता है तथा एक परीक्षण से यह सिद्ध हुआ है, कि । Atomic Radiation का प्रभाव जब अन्नों पर पड़ता है, तो उस अन्न को भस्म के पानी में डालकर कुछ घण्टे रखने से एटाॅमिक रेडिएशन का प्रभाव कम हो जाता है।

यज्ञ के भस्म का सेवन
सभी प्रकार के रोगों मंे यज्ञ शेष भस्म को छानकर प्रति 1 लीटर पानी में 2 ग्राम से 5 ग्राम की मात्रा में कपडे़ की पोटली बनाकर जल पात्र में रखकर 8 घंटे के बाद यही पानी पीए। इसी जल मे सोंठ का प्रयोग भी अत्यंत लाभदायक है। सामान्य व्यक्ति भी स्वास्थ्य लाभ हेतु इस पानी को पी सकते है।

आयुर्वेदिक धूम चिकित्सा

आयुर्वेद में औषधियों के धूम्र से कई प्रकार के रोगों को दूर करने का विधान है। यहाँ तक की स्वस्थ व्यक्ति को भी अपने स्वास्थ्य रक्षण व संवधर््न के लिए प्रतिदिन औषधीय द्रव्यों से निर्मित धूम्र का सेवन करना चाहिए।
धूमपान से ठीक होने वाले विभिन्न रोगों का वर्णन ‘च.सं.सू. मात्राशितीया.’ के सूत्र सं. 20-55 में पूरा प्रकरण चला है, जिसमें धूमपान का समय, लाभ, योग, प्रकार, अतिमात्रा में हानि, धूमपान के लिए योग्य-अयोग्य व्यक्ति आदि का विस्तृत वर्णन है।
धूमपान करने से सिर का भारीपन, शिरदर्द, पीनस (sinus), आधाशीशी, कर्णशूल, नेत्रशूल, खाँसी, हिचकी, दमा, गला-घुटना, दाँतों की दुर्बलता, कान-नाम व आँख से दोष जन्य पानी बहना, नाक से दुर्गन्ध, दन्त शूल, अरुचि, हनुग्रह (जबड़े का बैठ जाना तथा कम खुलना), मन्या-स्तम्भ (Torticollis) जिसमें गर्दन टेढ़ी हो जाती है, कण्डू (खुजली), कृमि, चेहरे का पीला पड़ना, मुख से कपफ निकलना, स्वरभेद (गला-बैठना), गलशुण्डिका (Tonsillitis), उपजिह्निका (जिह्ना के पास एक गाँठ), शिर के बाल झड़ना, पीला पड़ना तथा गिरना, छींक आना, अतितन्द्रा, जड़ता, अतिनिद्रा आदि रोग शान्त होते हैं तथा बाल, कपाल और श्रोत्र-त्वचा-चक्षु-जिह्ना-घ्राण तथा कण्ठ-स्वर का बल बढ़ जाता है। जत्रु (गले के नीचे गोल हड्डी) के ऊपरी भाग में होने वाले सभी रोग अर्थात् विशेषकर शिर में होने वाले वात-कफ जन्य रोग अधिक प्रबल नहीं होते।
धूमोपयोगात्पुरूषः प्रसन्नेद्रियवाड््मनः।
दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगंधिवदनो भवेत्।। -(बृ.नि.रत्न.धूमपान.- पृ. 1073)
अर्थ- धूम का उपयोग होने से मनुष्य चक्षुरादि इन्द्रिय, वाणी तथा अंतःकरण से प्रसन्न रहता है तथा केश, दांत और दाढ़ी इनमें बल आता है व मुख सुगंधित रहता है।
मनस्तापं रजः क्रोधं धूमपाने निवारयेत्। -(बृ.नि.रत्न.धूमपान.- पृ. 1076)
धूमपान करने से मन का संताप, रजोगुण तथा क्रोध् दूर होता है।
अन्येऽपि धूमा गेहेषु कर्तव्या रोगशान्तये।
मयूरपिच्छं निम्बस्य पत्राणि बृहतीपफलम्।।
मरिचं हिड्गु मांसी च बीजं कार्पाससम्भवम्।
गजदन्तश्च तच्चूर्णं कि´िचद्घृतविमिश्रितम्।
गेहेषु धूपनं दत्तं सर्वान्बालग्रहा´जयेत्।
पिशाचान्राक्षसा´िजत्वा सर्वज्वरहरं भवेत्। -(शारड्गधरसं. उ.ख. 21-24)
रोगों के शमनार्थ घर में धूप देना चाहिए। मोर का पंख, नीम पत्र, बड़ी कटेरी का फल, काली मिर्च, हींग, जटामांसी, कपास ये सब समान मात्रा में लेकर के चूर्ण बनाते हैं और घी मिलाकर गोला-सा बना लेते हैं। इसको घर में जलाने से बच्चों के सभी प्रकार के लगने वाले ग्रह तथा सूक्ष्म जीवों (चपतपजेए हमतउे – इंबजमतपं) से होने वाले सभी प्रकार के उपद्रव-ज्वरों को दूर करता है।
शिरःकण्ठाक्षिशूलेषु गौरवेऽद्र्धावभेदके।
दन्तशूलप्रतिश्याये हिध्माश्वासगलग्रहे।।
कासे दशनदौर्गन्ध्ये हनुमन्याग्रहेऽरुचै।
घ्राणस्य गन्धे घ्राणस्य कर्णस्त्रावे क्रिमिष्वपि।।
वैस्वर्यश्वयथौ तन्द्रावृद्धिमोहात्र्तिनिद्रयोः।
प्रसेके दन्तविद्रध्यां गलशुह्युपजिह्वयोः।।
सिर, कंठ व नेत्रों के शूल में गौरव (भारीपन), आधाशीशी (माइग्रेन), प्रतिश्याय (जुकाम), हिचकी, श्वास (अस्थमा), गला बैठना, कास (खाँसी), दाँतों की दुर्गन्ध, हनु एवं मन्या की जकड़न, अरुचि, नासिका की दुर्गन्ध, कर्णस्राव क्रिमि, स्वरविकार, सूजन, तन्द्रा, मोह, अतिनिद्रा, दन्तविद्रधि, गलशुण्डी, उपजिह्ना आदि विकारों को औषधीय धूम दूर करता है।
शारङ्गध्र संहिता में धूम के छः प्रकार बताये हैंµ
धूमस्तु षड्विधः प्रोक्तः शमनो बृंहणस्तथा।
रेचनः कासहा चैव वामनो व्रणधूपनः।। -(शारङ्गधर सं. उ.ख.9.1)
1. शमन (Palliative)- यह दुष्ट दोषों को बाहर न निकालकर अन्दर ही शान्त कर देता है।
2. बृंहण (Strengthening)- यह धातुओं (रस रक्तादि) की पुष्टि करता है।
3. रेचन (Purgative)- यह दुष्ट दोषों को शरीर से बाहर निकाल देता है।
4. कासहा (Antitussive)- यह खाँसी को दूर करता है।
5. वामन (Emetiv)- यह वमन कराता है।
6. व्रण धूपन (Fumigation of ulcers)- यह व्रण के कीटाणुओं से रक्षा करता है और शीघ्र ही व्रण के रोपण के लिए प्रयुक्त होता है।
कासश्वासप्रतिश्यायान्मन्याहनुशिरोरुजः।।
वातश्लेष्मविकारांश्च हन्याद् धूमः सुयोजितः।
धूमप्रयोगात्पुरुषः प्रसन्नेन्द्रियवाङ्मनाः।।
दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिवदनो भवेत्।। -(शारङ्गधर सं. उ.ख. 9-11)
कास (Cough), श्वास (Dyspnoea), प्रतिश्याय (cold), मन्या (Torticollis), ठुड्डी तथा सिर के रोग को ठीक प्रकार से प्रयोग किया गया धूम नष्ट करता है। धूमपान के सेवन से मनुष्य प्रसन्न इन्द्रिय, प्रसन्न स्वर तथा प्रसन्न चित्त वाला होता है। इससे केश, दांत और दाढ़ी-मूछ दृढ़ तथा मुख सुगन्ध् युक्त होता है। -(वैद्य प्रसारकम् 10.507)
मनः शिलाले क्षारश्च पिप्पल्योऽथ फणिज्जकम्।
केसरं सर्षपाश्चैव धूमः शीर्षविरेचनः।। -(वैद्य प्रसारकम् 10 पृ. 507)
मैनसिल, हरताल, क्षार, पिप्पली, मुलेठी, नागकेसर और सरसों- इन्हें एक-एक पल (100 ग्राम) की मात्रा में लें और जला कर धूम करें। इससे शिरोगत कफ्रफ का शोधन होने से नाना शिरों-विकारों का शमन होता है।
चरक संहिता के सद्वृत्त में तीन प्रकार के धूम प्रयोग का उपदेश है-
प्रायोगिक, स्नैहिक, शिरो-वैरेचनिक ।

1. प्रायोगिक (शमन)
मधुकपद्मकम´िजष्ठासारिवामुस्तापुन्नागकेसरैलवालुक-सुवर्णत्वक्तमालपृथ्वीकाहरेणुलाक्षाशतपुष्पासल्लकीशर्करामदनकमरूबकन्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थल्पक्षलोध्रत्वक् पद्मोत्पलानि सर्वगन्धद्रव्याणि च। कुष्ठतगरवज्र्यानि प्रायोगिकधूमोपयोगीनि।। -(अष्टाङ्गसंग्रह 15.7)
मुलहठी, पद्माख, मंजीठ, सारिवा, मुस्ता (नागरमोथा), पुन्नाग (नागकेसर), तमाल (तेजपत्र), पृथ्वीका (बड़ी इलायची), हरेणु (निर्गुण्डी), लाक्षा, शल्लकी, शर्करा, मदनक (मैनफल), मरूबक (मरवा), बरगद, पिप्पली, पिलखन, गूलर की छाल, पद्म, उत्पल और सब गन्ध वाले द्रव्य प्रायोगिक धूम्रपान में उपयोगी है, कुष्ठ और तगर को छोड़कर।

2. स्नैहिक (बृहंण)
अगुरुगुग्गुलुसल्लकीशैलेयकनलदह्रीबेरहरेणूशीरमुस्ताध्यामकवराङ्गश्रीवेष्टकस्थौणेयकपरिपेलवैलवालुककुन्दुरुकसर्जरसयष्टयाह्नफलसारस्नेहमधूच्छिष्टबिल्वफलमज्जयवतिलमाषकुङ्गकुमानिमेदोमज्जवसासर्पीषि च स्नैहिकधूमोपयोगीनि।। -(अष्टांगसंग्रह 15.8)
अगर, गुग्गुल, शल्लकी, शैलेयक (छरीला), नलद, ह्रीबेर (सुगंध्बाला), हरेणु (निर्गुण्डी), उशीर (खस), मुस्ता (नागरमोथा), वरांग, श्रीवेष्टक (चीड़ के गोंद), स्थौणेयक (थुनेर), परिपेलव, ऐलवालुक, कुन्दरुसर्जरस, मुलहठी, फलसार, मोम (मधुमक्खी का छत्ता), बिल्वफल की मज्जा, जौ, तिल, माष, केसर, घी, ये स्नैहिक धूम के लिए उपयोगी है।

मधूकं मधुकं द्राक्षा मधूच्छिष्टवसा घृतम्।
मज्जा धूम श्रेशेऽयं स्नैहिको रोगनाशन।। -(वैद्य प्रसारकम् 10.507)
मधूक (महुए का पुष्प), मुलेठी, द्राक्षा (मुनक्का), वसा, घृत एवं मज्जा इन्हें एक-एक पल (100 ग्रामल् की मात्रा में लें और इनसे धूम करें। यह स्नैहिक धूम नाना रोगों को नष्ट करता है।

3. शिरो-वैरेचनिक (शोधन/तीक्ष्ण)
शिरोविरेकद्रव्याणि गन्धद्रव्याणि च तीक्ष्णानि।
मनोह्वाहरितालं चेति तीक्ष्णधूमोपयोगीनि।। -(अष्टाङ्गसंग्रह 15.9)
शिरोविरेचन के उपयोगी द्रव्य और तीक्ष्ण गन्ध द्रव्य, मैनसिल, हरताल ये तीक्ष्ण धूम के लिये उपयोगी है।
अब हम क्रमशः वस्त्रादि धूपन एवं रोगानुसार औषधियों के धूपन को प्रस्तुत करते हैं।

1. वस्त्रधूपन एवं साँप कृम्यादि का विनाश-µ
सर्षपारिष्टपत्राभ्यां सर्पिषा लवणेन च।
द्विरह्नः कारयेद् धूपं दशरात्रमतन्द्रितः।। -(सु.सं.सू. स्थान 19.28)
सरसों, नीम पत्र, घृत और नमक इनके द्वारा दिन में दो बार दस दिन (10) तक निरन्तरता पूर्वक धूनी देनी चाहिये। प्राचीन विद्वानों ने घाव को भरने या सूखाने के लिये, शय्या, वस्त्र, भवन को प्रदूषण एवं जीवाणुरहित करने आदि के लिये धूपन के लाभ बताये हैं। -(डल्हण, शाङ्गधर भाष्यकार)
न कृत्याः कार्मणाद्याश्च धूपोऽयं यत्र दह्यते।। -(अष्टाङ्गसंग्रह 8.118)
जतु (लाख), सर्जरस (राल), उशीर (खस) सरसों, तेजपत्र, वालक (हृीबेर/सुगंधबाला), वेल्ल (वायविडंग या मरिच), अरुष्कर (भिलावा), पुर (गुग्गुल) और अर्जुन के फूल, इनका धूप निवासगृह में देने से स्थावर-जंगम विष नष्ट होते हैं। वहां पर विषैले कीट, चूहे, सांप आदि नहीं रहते।
शिखिपिच्छं बलाकास्थि सर्षपाश्चन्दनं घृतम्।
धूपो विषघ्नः शयनवसनासनगेहगः।। -(अष्टाङ्गसंग्रह 8.119)
मोर का पंख, सरसों, चन्दन, घी, इनको कूटकर इनका धुंआ, बिस्तर, आसन, वस्त्र, गृह में देना विषनाशक है।
लाक्षा भल्लातकश्च श्रीवासः श्वेतापराजिता। अर्जुनस्य पफलं पुष्पं विडंग सर्जगुग्गुलुः।।
एभिः कृतेन धूपेन शाम्यन्ते निहिते गृहे। भुजंगमूषकादंशघुणामशकमत्कुणाः।। -(बृ.नि.रत्न. कृमिरोगाधिकारः पृ. 64)
लाख, भिलावा, श्रीवास (चीड़ के गोंद/सरलधूप), सफेद अपराजिता, अर्जुन फल और फूल, वायविडंग, राल और गुग्गल इनकी धूनी घर में दें, तो सांप, चूहे, मच्छर, छोटे कीड़े और खटमल ये सब दूर होते हंै।
कुकुभकसुमं विडंगं लांगली भल्लातकं तथोशीरम्।
श्रीवेष्टकं सज्र्जरस चंदनमथ कुष्ठमष्टमं दद्यात्।।
एष सुगंधे धूपः सकृत्कृमीनां विनाशकः प्रोक्तः।
शय्यासु मत्कुणानां शिरसि च गात्रोषु यूकानाम्।। -(बृ.नि.रत्न. कृमिरोगाधिकार पृ. 64)
अर्जुनपुष्प, वायविडंग, पिठवन, भिलावा, राल, चन्दन, कूठ यह सुगंध धूप शय्या (सेज) में देने से खटमल मर जावें और अपनी देह को यह धूनी दें, तो सिर व अंग के जूंआ, लीख आदि नष्ट हो जाती है।
शिपिच्छसर्षपाश्चन्दनं घृतम्।
धूपो विषघ्नः शयनवसनासनदेहगः।। -(वैद्य प्रसारकम् 10. पृ. 508)
मोरपंख, सरसों, चन्दन एवं घृत इन्हें एक-एक पल (100 ग्राम) की मात्रा में लेकर धूपन करें।
यह धूप शय्या, आसन और शरीर के विष को शान्त करता है।
बिल्वं कफिलं मुस्तं सर्जः सिद्धार्थको गुडः।
अर्कस्य फलमेतेषां चूर्णं धूपः प्रयोजितः।।
मक्षिका मशकाः सर्पा मूषिका विषधारिणः।
निर्गच्छान्ति गृहं त्यक्त्वा यथा यद्धेषु कातराः।।4।। -(चिकित्सार्णव. पृ. 26.27/263)
बेल का फल, केवांच का फल, नागरमोथा, शाल का निर्यास (गोंद), सरसों, गुड़, आक फल इन समस्त द्रव्यों के चूर्ण का धूपन करने से मक्यिाँ, मच्छर, सांप, चूहे तथा अन्य विषैले जन्तु युद्ध में डरपोक की तरह घर छोड़कर भाग जाते हैं।
श्वेतापराजितामूलं विडंगसर्जगुग्गुलुः।
फलं पुष्पं चार्जुनस्य लाक्षाभल्लातकानि च।।
सश्रीवासानि चैतेषां चूर्णं धूपः प्रयोजितः।
मत्कुणा मशकाः सर्पाः कीटदंशाश्च मूषिकाः।।
गृहं त्यक्त्वां पलायन्ते यथा युद्धेषु कातराः।।5।। -(चिकित्सार्णव. पृ. 28.29/264)
सफेद अपराजिता मूल, वायविडंग, राल, गुग्गल, अर्जुन का फल तथा फूल, लाक्षा, भिलावा तथा श्रीवेष्टक (चीड़ का गोंद), इन द्रव्यों के चूर्ण का धूपन करने से खटमल, मच्छर, साँप, ततैया (पीली मक्खी) तथा चूहे आदि युद्ध में डरपोक की तरह घर छोड़कर भाग जाते हैं।
लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वतापराजिताशिफाः।
अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गं सर्जगुग्गुलू।।
एभि कीटाश्च शाम्यन्ते तिश्न्तोऽपि गृहे सदा।
भुजङ्गा मूषिका दंशा घुणा लूताश्च मत्कुणाः।
दूरादेव पलायन्ते क्लिन्नकीटाश्च ये स्मृताः।। -(भैषज्यरत्नावली पृ. 373)
लाक्षा, भल्लातक (भिलावा), विरोजा (चीड़ का गोंद) श्वेत अपराजितामूल, अर्जुन फल, वायविडंग, राल तथा गुग्गुल समभाग ले, सभी द्रव्यों को कूटकर चूर्ण बना लें।
उपयोग- कमरा बन्दकर इससे जहरीले धुंआ को जलाना चाहिए, धुंआ शान्त होने पर घर में प्रवेश करना चाहिए। इसके धूप से सभी कीड़े, साँप, चूहें, मच्छर, मकड़ी, खटमल भाग व नष्ट हो जाते हैं, साथ ही नमी से उत्पन्न होने वाले कीड़े भी नष्ट हो जाते हैं।
• वस्त्रों (बिस्तर, चादर और ओढ़ना) के शुद्धिकरण के लिए धूपन योग्य द्रव्य जौ, सरसों, हींग, गुग्गुल, वच, ब्राह्मी, सफेद दूब, जटामांसी, लाख, अशोक, कुटकी, अपामार्ग, नीम आदि औषधियों का धूपन देने से वस्त्रा शुद्ध व सुगन्ध्ति हो जाते हैं। -(च.सं. शारीरस्थान 8.61)।
• लाख, खस, तेजपत्ता, गुग्गुल, भिलावा, अर्जुन पुष्प, राल, श्वेत अपराजिता इनको समभाग में लेकर धूम्र करने से साँप, चूहा आदि, कपड़े में रहने वाले छोटे कृमियों को नष्ट करता है। -(चं.सं.चि. स्थानम्-23.100)

आह्वान
संस्कृति मनुष्य समाज की जड़ होती है, जैसे पेड़ की जड़। पेड़ अपनी जड़ को छोड़ देता है, तो सूख जाता है, नष्ट हो जाता है। अपने अस्तित्व को खों देता है, वैसे ही मनुष्य समाज जब अपने मूल को, जड़ को भूल जाता है अर्थात् अपनी संस्कृति को भूल जाता है, तो अपने अस्तित्व को खों देता है वह जीवन में अनेकों प्रकार के कष्ट-दुःख-अज्ञान-अभावादि से युक्त हो जाता है।
अतः आईये भोगोन्माद, मजहबोन्माद, एवं युद्धोन्माद रूपी पाश्चात्य संस्कृति को नहीं अपितु सार्वभौमिक, वैज्ञानिक एवं पंथ-निरपेक्ष पावनी संस्कृति, भारतीय संस्कृति, याज्ञिक संस्कृति को अपनायें। भाग्य हाथों की लकीरों में नहीं अपितु भाग्य लिखने की यज्ञ रूपी कलम हमारे हाथों में है। तो आईये स्वयं यज्ञ को अपनायें एवं यज्ञीय जीवन जीये और अपने सौभाग्य को जगायें।

न करो और प्रदूषण करने की भूल।
यज्ञ से जुड़ों यह है संस्कृति का मूल।।
भाग्यं न हस्तरेखासु, लिखितं केनचिदपि।
स्वभाग्यं लिखितुं मित्रम्, यज्ञो भवति लेखनी ।।

हस्ते आदाय तां मित्रम्, लिख भाग्यं यथेप्सितम।
तदेव फलति काले, विविधं लभते सुखम् ।।