वर्तमान की आवश्यकता ‘यज्ञ’

भारतीय संस्कृति में ‘यज्ञ, योग एवं आयुर्वेद’ जैसी अमूल्य विद्याएं एवं विधाएं हैं, जो इस संस्कृति की ‘मुकुटमणि’ है। इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो ‘भगवान् श्रीराम, भगवान् श्रीकृष्ण’ से लेकर राजा- महाराजाओं, ग्रामवासियों व अरण्यवासि-ऋषियों की कुटियों तक नित्य व नैमित्तिक यज्ञ का प्रचलन देखने को मिलता है, जो सार्वभौमिक, वैज्ञानिक एवं पंथनिरपेक्ष पावनी परंपरा है।